द्विवेदी ने साहित्य को लोक चेतना से जोड़कर देखा : अरविंदाक्षन

बेंगलुरु, 19 सितंबर हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार, आलोचक एवं निबंधकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को केवल राजनीति या अर्थशास्त्र के नजरिये से नहीं देखा, बल्कि उसे भारतीय समाज की दीर्घकालीन सांस्कृतिक निरंतरता और लोक चेतना से जोड़कर परखा। हिंदी और मलयालम साहित्य के विद्वान एवं लेखक डॉ. ए. अरविंदाक्षन ने एक संगोष्ठी में यह बात कही।
‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट’ की ओर से शनिवार को जारी एक बयान के अनुसार, अरविंदाक्षन ने कहा कि द्विवेदी का साहित्य लोक मानस के लिए रचा गया था और उनके संपूर्ण लेखन में मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य रहा।
ट्रस्ट और ‘क्राइस्ट डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी’ की ओर से आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुये अरविंदाक्षन ने कहा कि द्विवेदी ने साहित्य को केवल राजनीति या अर्थशास्त्र के चश्मे से नहीं देखा, बल्कि उसे भारतीय समाज की दीर्घकालीन सांस्कृतिक निरंतरता और लोक चेतना से जोड़कर परखा।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के सम कुलपति रह चुके अरविंदाक्षन ने कहा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने संत साहित्य की जो व्याख्या की, उसका मुख्य लक्ष्य उसमें निहित सार्वभौमिक मानवीय भावना को उजागर करना था।
‘क्राइस्ट डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी’ की रजिस्ट्रार डॉ. ज्योति कुमार ने कहा, ‘‘मैं पहली बार देख रही हूं कि किसी लेखक के गद्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी हो रही है, अन्यथा काव्य पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है।’’
उन्होंने कहा कि आचार्य द्विवेदी की साहित्यिक विरासत उत्तर भारत तक सीमित नहीं रही और दक्षिण भारत भी उसका साक्षी बन रहा है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय भविष्य में भी इस तरह की संगोष्ठियों और सम्मेलनों के आयोजन का प्रयास करेगा।
रांची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. वी. एन. पांडेय ने कहा कि आचार्य द्विवेदी स्वयं बेंगलुरु आए थे या नहीं, यह ज्ञात नहीं है, लेकिन उन्होंने अपने निबंध ‘शिरीष के फूल’ में कर्नाटक का उल्लेख किया है।
उन्होंने कहा, ‘‘द्विवेदी के साहित्य पर बात करना ‘ओर से छोर’ यानी पुरातन से अधुनातन तक की बात करने के समान है।’’
‘ग्लोबल हिंदी फाउंडेशन’ की चित्रा गुप्ता ने सिंगापुर से अपने ऑनलाइन संदेश में कहा कि आचार्य द्विवेदी के निबंधों में बार-बार यह संदेश मिलता है कि ज्ञान का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं, बल्कि एक बेहतर, संवेदनशील और विवेकशील मनुष्य बनना है।
उन्होंने सुझाव दिया कि विदेशों में जहां-जहां हिंदी पढ़ाई जाती है, वहां आचार्य द्विवेदी के निबंधों को 12वीं कक्षा, स्नातक और परास्नातक के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।
‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेमोरियल ट्रस्ट’ की अध्यक्ष डॉ. अपर्णा द्विवेदी ने आचार्य द्विवेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला तथा हिंदी और साहित्य के क्षेत्र में ट्रस्ट की गतिविधियों एवं आगामी योजनाओं की जानकारी दी।
बयान के अनुसार, संगोष्ठी में विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र भी प्रस्तुत किए।
सियासी मियार की रीपोर्ट
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