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कविता : हर अपना अपना नहीं

कविता : हर अपना अपना नहीं

-डॉ. प्रियंका सौरभ-

हर अपना अपना नहीं, भ्रम में रहना छोड़।
समय पड़े तो देखिए, कौन निभाता जोड़। ।

रावण को विश्वास था, कुल है पूरा साथ।
सत्य सामने आ गया, छूट गए सब हाथ। ।

कुंभकर्ण ने साथ दे, निभाया भ्रातृ धर्म।
सच का स्वर दबा रहा, अधूरा रहा कर्म। ।

सत्य विभीषण ने कहा, सह न सका अन्याय।
अपनों ने ही त्याग कर, दी उसको तब हाय। ।

साथ खड़ा होना नहीं, बस रिश्ते की बात।
गलत राह से रोक दे, वह है सच्चा साथ। ।

गलती पर जो मौन रह, कैसा उसका नेह।
पास रहे सच ना कहे, मन में कैसी हेय। ।

परिवार वही आईना, दिखला दे सच रूप।
गिरने से ही थाम ले, दूर करे हर कूप। ।

सुख में तो सब साथ हैं, दुख में मिले न मीत।
जो विपदा में साथ दे, समझो सच्ची प्रीत। ।

भटके पथ पर रोककर, जो दिखला दे राह।
वही सगा कहलाएगा, वह है सच्ची चाह। ।

रिश्ते केवल रक्त के, होते नहीं महान।
सत्य, विश्वास प्रेम से, बनता सच्चा मान। ।

समय सभी को परखता, खुल जाता व्यवहार।
कौन पराया, कौन सँग, होता साफ विचार। ।

अंत समय बस यह समझ, जीवन का निष्कर्ष।
हर अपना अपना नहीं, सच्चा दुर्लभ हर्ष। ।

सियासी मियार की रीपोर्ट