मैं पानी हूं

-बसंत त्रिपाठी-
मैं पानी हूं
तरल बहूंगा तो बजूंगा
जैसे संतूर
लेकिन अभी तो रिसता हूं
रंध्रों से बेआवाज
पहुंचता हूं दूर, दूर, दूर
भीतर ही भीतर
वहां सदियों की नींद टूटती है जहां
मैं धरती के भीतर का पानी हूं
नदियों झरनों या समुद्र में नहीं
धरती के भीतर रहता हूं
मिट्टी और चट्टानों का लिहाफ ओढ़
मैं पानी हूं
मैं तुम्हारी प्यास ढूंढ़ता हूं।।s
सियासी मियार की रीपोर्ट
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