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महाशिवरात्रि (15 फरवरी) पर विशेष: श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर, हारोहल्ली : पत्थर में साँस लेता इतिहास और भक्ति का अनंत स्वर

महाशिवरात्रि (15 फरवरी) पर विशेष: श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर, हारोहल्ली : पत्थर में साँस लेता इतिहास और भक्ति का अनंत स्वर

ब्रह्मा और विष्णु ने शिव के तेज का आदि-अंत खोजने की कोशिश की, तब वे एक अनंत अग्नि-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। वही ‘अग्नि-लिंग’अरुणाचल कहलाया। हारोहल्ली का यह मंदिर उसी पवित्र स्वरूप की याद में निर्मित बताया जाता है। यहाँ भगवान शिव का लिंगाकार रूप पत्थर की गहराई में प्रतिष्ठित है -इतना प्राचीन कि लगता है जैसे धरती स्वयं इसकी आराधना करती हो।

मानव इस भौलिकवादी युग में इतना लिप्त हो चुका है। वह जीवन जीने का तरीका व सलीका भुल गया है। तभी तो वहअपने जीवन जीविका के जंग में इतना उलझ कर रह जाता है, वह स्वयं अपने को अकेला -अ सहाय महसुस करता है। आज हम आप को एक ऐसी दिव्य पवित्र स्थली के बारे बताने जा रहे है, जहाँ जीवन की दौड़ में अचानक थम-सा जाता है-जब किसी स्थान की नीरवता, किसी मंदिर की घंटी की ध्वनि या किसी पत्थर की ठंडक भीतर तक उतर जाती है। इसके लिए आपको बेंगलुरु से लगभग 35 किलोमीटर दूर हारोहल्ली नामक पहुँचना होगा, विगत दिनों मुझे दक्षिण भारत के यात्रा पर जाने का अवशर मिला था। उनमें एक जगह का नाम है।

हारोहल्ली : जहाँ के पत्थरों में साँस लेता इतिहास और भक्ति का अनंत मौन के स्वर आज भी गुजंते है। जहाँ समय जैसे ठहर-सा गया है। हरियाली से घिरे इस शांत गाँव में विराजमान है -श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर, जिसे स्थानीय लोग “डोड्डा गुड़ी” कहते हैं। लगभग छः सौ वर्ष पुराना यह मंदिर दक्षिण भारत की स्थापत्य परंपरा, आस्था और दिव्यता का जीवंत उदाहरण है। बेंगलुरु से आध्यात्म की ओर कंक्रीट के जंगल और हाई-टेक जीवन के बीच बेंगलुरु की सड़कें अक्सर शोर से भर जाती हैं, पर जैसे ही आप कनकपुरा रोड की ओर निकलते हैं, हवा में ठंडक और मिट्टी की खुशबू महसूस होती है। यहीं कहीं, पहाड़ियों और खेतों के बीच अचानक एक पत्थर की गोपुरम(मंदिर द्वार)दूर से नजर आती है मानो कोई प्राचीन प्रहरी आज भी युगों से भक्ति की रखवाली कर रहा हो। यही है श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर-एक ऐसा स्थान, जहाँ पहुँचकर लगता है जैसे समय पीछे लौट गया हो, किसी ऐसे युग में जब शिल्प, साधना और श्रद्धा एक ही धारा में बहते थे।

अरुणाचलेश्वर – वह जो स्वयं प्रकाश है -भगवान शिव का यह स्वरूप अरुणाचलेश्वर कहलाता है। ‘अरुण’ का अर्थ है प्रकाश, और ‘अचल’ का अर्थ अविचल-अर्थात वह दिव्य शक्ति जो अडिग और अनंत है। एक पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मा और विष्णु ने शिव के तेज का आदि-अंत खोजने की कोशिश की, तब वे एक अनंत अग्नि-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। वही ‘अग्नि-लिंग’ अरुणाचल कहलाया। हारोहल्ली का यह मंदिर उसी पवित्र स्वरूप की याद में निर्मित बताया जाता है। यहाँ भगवान शिव का लिंगाकार रूप पत्थर की गहराई में प्रतिष्ठित है -इतना प्राचीन कि लगता है जैसे धरती स्वयं इसकी आराधना करती हो। मंदिर परिसर में कदम रखते ही जो दृश्य सामने आता है, वह किसी इतिहास ग्रंथ से निकलकर आया प्रतीत होता है। पत्थर के विशाल स्तंभ, जिन पर नक्काशीदार आकृतियाँ बनी हैं-कहीं नर्तकियों का समूह, कहीं सिंहासन पर विराजमान देवी-देवता, कहीं युद्ध दृश्य- हर आकृति अपनी कहानी कहती है। स्थानीय श्रद्धालुमो का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण 15वीं शताब्दी में हुआ था, जब दक्षिण भारत में चोल, होयसला और विजयनगर स्थापत्य शैलियाँ एक-दूसरे को प्रभावित कर रही थीं।

मंदिर का गोपुरम ऊँचा और कलात्मक है। उस पर उकेरे गए देव प्रतिमाएँ पत्थर में गढ़ी हुई भक्ति की मूर्त अभिव्यक्ति लगती हैं। धूप जब उन पर पड़ती है तो लगता है जैसे देवता स्वयं जीवंत होकर मुस्करा रहे हों। मंदिर का दिव्य -भव्य परिसर-जहाँ हर स्तंभ बोलता है-जैसे-जैसे आप मंदिर के अंदर बढ़ते हैं, ठंडी हवा के बीच घंटियों की मंद-मधुर ध्वनि गूँजती है। मुख्य गर्भगृह में विराजमान हैं भगवान अरुणाचलेश्वर, और साथ ही परिसर में कई अन्य शिवलिंग – वैद्यनतेश्वर, मरालेश्वर, नंजुंदेश्वर – जिनकी पूजा सदियों से होती आ रही है। हर शिवलिंग मानो जीवन के किसी एक पक्ष का प्रतीक है-स्वास्थ्य, तप, त्याग और ज्ञान का। मंदिर के बीचोबीच एक प्राचीन दीपस्तंभ खड़ा है-जिस पर समय की परतें तो हैं, पर आस्था की चमक अब भी वैसी ही है। जब आप मंदिर के प्रांगण में खड़े होकर गहरी साँस लेते हैं, तो लगता है जैसे हवा भी ॐ नमः शिवाय का जाप कर रही हो। पत्थरों से छनती सूर्य की किरणें शिवलिंग पर पड़ती हैं तो एक अद्भुत दृश्य बनता है-भक्ति और प्रकृति का ऐसा संगम, जहाँ आँखें बंद किए बिना भी ध्यान लग जाता है। हम जब पहुँचे तो सुबह का समय था। मंदिर के चारों ओर फैली हरियाली, पास के नारियल के वृक्ष और पक्षियों की चहचहाहट-यह सब मिलकर एक दिव्य वातावरण बना रहे थे। एक वृद्ध पुजारी ने मुस्कराते हुए कहा कि “बेटा, यहाँ केवल दर्शन नहीं होते, यहाँ मन शांत होता है। जो एक बार यहाँ आता है, उसका हृदय यहीं टिक जाता है। ” इतिहास की परतें और लोककथाएँ -स्थानीय लोककथाओं में कहा जाता है कि यह स्थान कभी घने जंगलों से घिरा था और पास से एक छोटी धारा बहती थी। स्थानीय लोगों का मानना है कि एक साधक ने वर्षों तक यहाँ तपस्या की थी, जिसके बाद शिव ने उसे अरुणाचलेश्वर रूप में दर्शन दिए। कई लोग इस मंदिर को तिरुवन्नामलई स्थित प्रसिद्ध अरुणाचलेश्वर मंदिर का शाखा रूप मानते हैं। दोनों के बीच अदृश्य आध्यात्मिक संबंध की बातें आज भी गाँव के बुजुर्ग श्रद्धा से बताते हैं।
छह शताब्दियों की जीवित विरासत 600 वर्षों का सफर किसी इमारत के लिए लंबा होता है, लेकिन इस मंदिर ने समय को ऐसे झेला है जैसे पत्थर ने तूफानों को। यहाँ की दीवारों पर आज भी प्राचीन तेल चित्रों और पौराणिक प्रतीकों के धुंधले निशान दिखाई देते हैं। मंदिर का हर कोना अतीत की गवाही देता है-किसी युग का, जब कला, धर्म और जीवन एक-दूसरे से जुड़कर अस्तित्व रचते थे। मंदिर के भीतर कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ खड़े होते ही एक अजीब-सी ऊर्जा महसूस होती है। कई श्रद्धालु बताते हैं कि यहाँ ध्यान करने पर मन अपने आप शांत हो जाता है। कुछ लोग इसे “गरबा गुड़ी” कहते हैं – अर्थात वह स्थान जहाँ दिव्य शक्ति का निवास है। जब आरती के समय घंटियाँ एक साथ बजती हैं, तो पत्थरों की दीवारें भी मानो मंत्रोच्चार करने लगती हैं। ऐसी यात्रा -जहाँ मन ठहर जाता है-हारोहल्ली का यह मंदिर केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। जब आप सड़क से गाँव की गलियों में प्रवेश करते हैं, तो चारों ओर सादगी बिखरी मिलती है-मिट्टी के घर, नारियल के पेड़, और हर ओर मंदिर की घंटियों की मंद गूँज। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही सब कुछ बदल जाता है। वहाँ कोई शोर नहीं, कोई भीड़ नहीं – बस शांति, जो धीरे-धीरे भीतर उतरती जाती है। एक क्षण के लिए ऐसा लगता है कि मानो ये पत्थर केवल वास्तु नहीं, बल्कि ध्यानस्थ साधक हैं, जो शताब्दियों से मौन साधना में लीन हैं। यदि आप इस पवित्र स्थान पर जाना चाहते हैं, तो मंदिर के दर्शन का समय इस प्रकार है-सुबह : 7:00 बजे से 12:00 बजे तक, शाम : 5:00 बजे से 7:00 बजे तकबेंगलुरु से निजी वाहन या कैब द्वारा पहुँचना सबसे सुविधाजनक है। रास्ता सुंदर है-खेतों, पहाड़ियों और गाँवों के बीच से गुजरता हुआ।
आप चाहें तो कनकपुरा रोड से आगे बढ़ते हुए कुछ स्थानीय भोजनालयों में रुककर दक्षिण भारतीय व्यंजनों का आनंद भी ले सकते हैं। शांत गाँव, जीवंत संस्कृति मंदिर के आसपास का गाँव बहुत शांत और सौम्य है। यहाँ के लोग श्रद्धालु पर्यटकों का स्वागत सादगी से करते हैं। त्योहारों के समय मंदिर परिसर रंगों और दीपों से जगमगा उठता है। शिवरात्रि, कार्तिक मास और महा दीपोत्सव के अवसर पर सैकड़ों श्रद्धालु यहाँ एकत्र होते हैं। उस समय हारोहल्ली की गलियाँ भक्ति संगीत से भर जाती है, मानो सारा गाँव शिवमय हो गया हो। इस मंदिर की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहाँ शिल्प और श्रद्धा एक-दूसरे में विलीन हैं। प्रत्येक पत्थर पर उत्कीर्ण आकृति मानो कहती है- “यह केवल कला नहीं, यह भक्ति का विस्तार है। ”शिव के रूप में यहाँ का अरुणाचलेश्वर भक्त को बाहरी संसार से काटकर अंतर्यात्रा की ओर ले जाता है। हारोहल्ली का श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जीवंत आध्यात्मिक केंद्र है। यहाँ की नीरवता में एक ऐसा संगीत छिपा है, जिसे केवल हृदय सुन सकता है। यह मंदिर हमें सिखाता है कि आस्था कभी समय पर निर्भर नहीं करती-वह तो पत्थर, हवा और धूप में भी जीवित रहती है। जब आप विदा लेते हैं, तो पीछे मुड़कर मंदिर के गोपुरम को देखना न भूलें। सूर्य की अंतिम किरणें जब उस पर पड़ती हैं, तो लगता है, जैसे स्वयं भगवान शिव मुस्कराते हुए आशीर्वाद दे रहे हों- “चलो, अब जीवन में लौटो, यहाँ की परम शांति अपने साथ लेकर जाओ। ”भक्ति, इतिहास और अनुभव का अद्भुत संगम-बेंगलुरु से हारोहल्ली की यह यात्रा केवल दूरी तय करना नहीं है, यह स्वयं से मिलने की यात्रा है। श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर अपने भीतर छह शताब्दियों की कथाएँ, अनगिनत भक्तों की भावनाएँ और कला की अमर धरोहर समेटे हुए है।
यहाँ आकर आप महसूस करते हैं -कि मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, वह मनुष्य और ईश्वर के बीच मौन संवाद का पुल है। श्री अरुणाचलेश्वर मंदिर, हारोहल्लीजहाँ हर पत्थर प्रार्थना है, हर घंटी ध्यान है, और हर श्वास में बस एक ही शब्द गूँजता है।

सियासी मियार की रीपोर्ट