भारतीय न्यायपालिका में जवाबदेही पर संसद में बड़ी रिपोर्ट; 9 वर्षों में जजों के खिलाफ आईं 8,600 से अधिक शिकायतें, सरकार ने ‘इन-हाउस मैकेनिज्म’ के तहत कार्रवाई का बताया पूरा प्लान

नई दिल्ली, 14 फरवरी । देश की न्यायपालिका की शुचिता और जजों के आचरण को लेकर केंद्र सरकार ने लोकसभा में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लिखित जवाब में जानकारी दी कि वर्ष 2016 से 2025 के बीच मौजूदा जजों के खिलाफ कुल 8,639 शिकायतें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) के कार्यालय को प्राप्त हुई हैं। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 शिकायतों के मामले में सबसे ‘व्यस्त’ रहा, जिसमें अकेले 1,170 शिकायतें दर्ज की गईं। यह वृद्धि न्यायिक आचरण के प्रति जनता की बढ़ती सतर्कता और मुखरता का संकेत देती है, जिसमें प्रशासनिक और व्यक्तिगत आचरण से जुड़े विभिन्न गंभीर विषय शामिल हैं।
जजों के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कानून मंत्री ने बताया कि इसके लिए न्यायपालिका के भीतर ही एक ‘इन-हाउस मैकेनिज्म’ सक्रिय है। सरकार इस प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप नहीं करती, बल्कि यह व्यवस्था 1997 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित प्रस्तावों ‘रेस्टेटमेंट ऑफ वैल्यूज ऑफ ज्यूडिशियल लाइफ’ और ‘इन-हाउस प्रोसीजर’ पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बरकरार रखना है, ताकि जजों के आचरण की समीक्षा और उन पर होने वाली कार्रवाई किसी बाहरी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव से मुक्त रहकर निष्पक्ष रूप से संपन्न की जा सके।
वर्तमान व्यवस्था के तहत शिकायतों को पद की गंभीरता के आधार पर श्रेणियों में विभाजित किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के जजों और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें सीधे सीजेआई को भेजी जाती हैं, जबकि अन्य जजों के मामले संबंधित हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देखते हैं। सरकार को सार्वजनिक शिकायत पोर्टल (सीपीजीआरएएमएस) के माध्यम से प्राप्त होने वाली शिकायतों को भी अंतिम निर्णय हेतु सीधे न्यायपालिका के संबंधित प्राधिकरणों को प्रेषित कर दिया जाता है। इस पारदर्शी प्रणाली का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायपालिका स्वयं अपनी जवाबदेही तय करे और आम जनता का भरोसा इस सर्वोच्च संस्थान पर सदैव बना रहे।
सियासी मियार की रीपोर्ट
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