समान नागरिक संहिता से आदिवासी समुदाय को कोई नुकसान नहीं : शाह

नई दिल्ली, 25 मई। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आदिवासी समुदाय के लोगों से समान नागरिक संहिता (यूसीसी) नहीं डरने की अपील करते हुए कहा कि उन्हें इससे कोई नुकसान नहीं होगा। श्री शाह ने यहां के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में ‘तू- मैं एक रक्त, वनवासी-ग्रामवासी-नगरवासी, हम सब भारतवासी’ नाम से आयोजित जनजातीय सांस्कृतिक समागम को संबोधित करते हुए कहा, “यह समागम आने वाले वर्षों तक जनजातियों के ‘महाकुंभ’ के रूप में जाना जाएगा। आप देश के दूर-दराज के इलाकों से, पारंपरिक वेशभूषा में, अपने वाद्य यंत्रों के साथ और अपनी संस्कृति के गीत गाते हुए यहाँ आए हैं, तो मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि मैंने अपने जीवन में कभी भगवान बिरसा मुंडा को नहीं देखा, लेकिन आज भगवान बिरसा मुंडा साक्षात मेरे सामने प्रकट हुए हैं। मैं आप सभी को नमन करता हूँ। ”
उन्होंने कहा, “हमारे संविधान निर्माताओं ने हर व्यक्ति को अपने मूल धर्म में आत्म-सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया है। लोगों को लालच देकर किसी का धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। अब हमें दिल्ली की इस धरती से अपने धर्म की रक्षा करने की शपथ लेनी चाहिए और यह हमें हमारी संस्कृति और हमारे देश से जोड़े रखेगी।” केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा, “मैं मध्य प्रदेश और गुजरात से आए अपने सभी भाइयों और बहनों का, मध्य प्रदेश और गुजरात के भील और मुंडा समुदायों का, छत्तीसगढ़ के गोंड और कोलाम समुदायों का, झारखंड और ओडिशा के संथाल और उरांव समुदायों का, पूर्वोत्तर के बोडो, कार्बी, दिमासा, खासी, गारो और चकमा समुदायों का, और आंध्र प्रदेश के चेंचु समुदायों का तहे दिल से स्वागत करता हूँ। मैं दोनों संगठनों का गहरा आभार व्यक्त करना चाहता हूँ कि उन्होंने मुझे अपने जीवनकाल में इस अद्भुत आयोजन का साक्षी बनने का यह अवसर दिया।”
उन्होंने कहा कि इस वर्ष भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती मनाई जा रही है। यह जल, यह वन और ये पहाड़ हमारे आदिवासी भाइयों की आजीविका का स्रोत हैं और एक अभेद्य दुर्ग हैं जो उनकी पहचान और संस्कृति की रक्षा करते हैं। उन्होंने कहा, “आज यदि दुनिया में कोई ऐसा मॉडल है जो सबसे अधिक टिकाऊ है, तो वह हमारे जनजातीय समुदायों द्वारा बनाया गया मॉडल है और हम इसकी रक्षा के लिए आगे आए हैं। सभी जनजातियों ने बिना किसी लिखित नियम के ‘अनेकता में एकता’ और ‘एकता में अनेकता’ के मंत्र को साकार करने का काम किया है।” श्री शाह ने कहा, “हज़ारों साल पहले त्रेता युग में भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाकर हमें बहुत साफ़ तौर पर यह समझाया था कि हम सब एक हैं। जो लोग हमें बाँटना चाहते हैं, वे यह नहीं जानते कि जब निषाद राज ने मदद का हाथ बढ़ाया, तो भगवान श्री राम ने उन्हें अपना परम मित्र बनाकर वनवासियों का सम्मान किया था। आज का यह सम्मेलन और यहाँ मौजूद लाखों आदिवासी लोग उन लोगों के लिए एक बड़ा संदेश हैं, जो फूट डालने का काम कर रहे हैं।”
उन्होंने ” समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर एक साजिश शुरू हुई है कि इसके जरिये आदिवासी लोगों को उनकी संस्कृति, उनकी परंपराओं, उनके रीति-रिवाजों और उनके जीने के अधिकार से वंचित कर देगा। आज, नरेन्द्र मोदी सरकार के गृह मंत्री के तौर पर मैं इस मंच से यह साफ़ कर देना चाहता हूँ कि यूसीसी की कोई भी पाबंदी आदिवासी समुदाय या आदिवासी व्यक्तियों पर नहीं लगाई जाएगी। यूसीसी किसी भी आदिवासी अधिकार का उल्लंघन नहीं करेगा। हमने दो राज्यों में यूसीसी लागू किया है, जहाँ भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है विशेषकर गुजरात और उत्तराखंड विशेष प्रावधान करके नरेन्द्र मोदी सरकार ने सभी आदिवासी समुदायों को यूसीसी से बाहर रखा है। इस संदेश के साथ अपने गाँवों, पहाड़ों, जंगलों में जाएँ और सभी आदिवासी समुदायों को जागरूक करें कि यूसीसी से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है।”
आयोजकों ने इस आयोजन को आदिवासी पहचान और ‘राष्ट्रीय एकता’ की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में पेश किया है, जिसका नारा है ‘तू मैं एक रक्त, वनवासी-ग्रामवासी-नगरवासी, हम सब भारतवासी.’ जेएसएम के एक पदाधिकारी ने बताया कि प्रतिभागियों से देश के विभिन्न हिस्सों से पारंपरिक परिधानों में आने की उम्मीद है, जबकि दिल्ली में स्वयंसेवकों ने 20 अलग-अलग समितियों के माध्यम से आवास, भोजन, परिवहन और चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था की है.
भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष पर आयोजित इस कार्यक्रम में पारंपरिक वेशभूषा में देश के कोने-कोने से जनजाति समाज के लोग राष्ट्रीय राजधानी पहुंचे और लोक संस्कृति के साथ शोभा यात्रा निकाली। इस समागम का आयोजन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ ने किया था, जिसमें कई संवेदनशील मुद्दे उठाये गये। इस समागम का सबसे बड़ा मुद्दा धर्मांतरण का रहा। समागम में आये जनजातीय समाज के लोगों का कहना था कि धर्म परिवर्तन के बाद भी कुछ लोग आदिवासी आरक्षण का लाभ ले रहे हैं, जिससे मूल जनजातीय समाज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। इसके अलावा फर्जी अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाण पत्र, आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा और तथाकथित ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ जैसे मुद्दे उठाये। समागम के आयोजकों का कहना था कि कुछ विदेशी ताकतें और मिशनरी संगठन आदिवासियों को उनकी सांस्कृतिक पहचान से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं।
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