जमुनापार वाली मोहब्बत: छोटे शहर के मिलेनियल प्रेम की मार्मिक कथा

हर दौर के प्रेम का अपना एक अलग स्वाद होता है। निर्देशक और लेखक शरद त्रिपाठी का उपन्यास “जमुनापार वाली मोहब्बत” मिलेनियल प्रेमी – चंदर और संध्या – की प्रेमकथा है, जो 90 के अंतिम वर्षों और 2000 के शुरुआती दशक में घटित होती है और एक पूरी पीढ़ी की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। यह वही दौर था जब 2003 क्रिकेट विश्वकप के फाइनल में भारत की हार ने युवाओं को ऐसा सदमा दिया था, जिसे भुलाना लंबे समय तक आसान नहीं था। यही घटना इस उपन्यास की एक रोचक पृष्ठभूमि भी बनती है, इसलिए यह प्रेमकथा उस समय की स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए है।
चंदर की नज़र से कही गई यह कहानी छोटे शहर के प्रेम की बारीकियों का बेहद सटीक चित्रण करती है – प्रेमिका का बस एक बार चेहरा देख भर लेना, खत लिखना, प्रेम-प्रसंग में नाम उछल जाने का डर, और वह दोस्त जो आपके प्रेमी को भाभी या जीजा कहकर छेड़ता है। इसी वजह से चंदर का मित्र कोतवाल सिंह किसी पुराने, बिछड़े दोस्त जैसा लगता है, जो परिस्थितियों के कारण समय के साथ पीछे छूट जाता है।
स्पष्ट है कि चंदर का नाम उसके पिता के धर्मवीर भारती-प्रेम से आया है; भारती के प्रतिष्ठित उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ के नायक से प्रेरित। त्रिपाठी का यह उपन्यास कई मायनों में भारती के लिए एक प्रेम-कविता भी है, क्योंकि इस कथा का समय वही है जब ‘गुनाहों का देवता’ युवाओं की विरासत हुआ करता था; एक ऐसा रोमांस, जिसे बार-बार जिया जाया जा रहा है, और जिस तरह पिछली पीढ़ियाँ उससे जुड़ी थीं, उसी तरह एक नई पीढ़ी भी उसके जादू को महसूस कर रही थी।
इस उपन्यास में त्रिपाठी ने प्रयागराज को एक जीवंत पात्र की तरह गढ़ा है। उसकी गलियों, मंदिरों, घाटों और दुकानों से होती हुई कहानी पाठक के दिल तक पहुँचती है। शहर छोड़ने की क्रिया और उसके साथ जुड़े एक किस्म के विलोपन को भी उन्होंने भावपूर्ण ढंग से पकड़ा है; जैसे चंदर के पिता का वाराणसी चले जाना, उसके भाइयों का शहर छोड़ देना, संध्या का भी शहर छोड़ना लेकिन चंदर का शहर में ही रहना। ये उपन्यास प्रयागराज के सिवाय कहीं और घटित हो; ऐसी परिकल्पना थोड़ी मुश्किल है क्यूंकि धर्मवीर भारती का चंदर और शरद त्रिपाठी का चंदर दोनों प्रयागराज में हीं बसते हैं और उन्हें वहाँ से कहीं और ले जाना उनके चरित्र को छीन लेने जैसा है।
“जमुनापार वाली मोहब्बत” प्रेम को एक पूरी पीढ़ी के निजी अनुभवों के साथ जोड़ती है। किशोरावस्था और तरुणाई की यादें अक्सर गहरे स्तर पर दर्ज होती हैं; क्रिकेट में हार, प्रेम में हार, और प्रेम करने से जुड़ा अपराध-बोध मिलकर युवावस्था की संवेदनाओं को आकार देते हैं। त्रिपाठी बड़ी संवेदनशीलता से दिखाते हैं कि कैसे प्रेम जैसी स्वाभाविक और जरूरी अनुभूति भी एक मासूम मन में अपराध-बोध का बीज बो सकती है, जो आगे चलकर जीवनभर का नासूर बन जाती है।
चंदर की बहन भारती का चरित्र इसी सामाजिक अपराध-बोध और समाज की शोषणकारी संरचना पर गहरी चोट करता है। प्रेम की अनुपस्थिति से टूटती भारती, और फिर सामाजिक स्वीकृति मिलते ही उसी ढांचे की पैरोकार बन जाना। इस बदलाव को त्रिपाठी बेहद सूक्ष्मता और संवेदना के साथ रेखांकित करते हैं।
प्रेम को समझने की त्रिपाठी की दृष्टि, और उसे बिना क्रिंज के रचने की उनकी कला, इस उपन्यास में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरती है। वे दिखाते हैं कि जैसे घरों के फर्श मिट्टी से मोज़ेक होते हुए अब टाइल्स हो गए, लेकिन बारिश आज भी वैसे ही गिरती है। अंतर सिर्फ इतना है कि मिट्टी पानी को सोख लेती थी, और टाइल्स उसे फिसला देती हैं। लेकिन पानी रुकता नहीं; वही पानी प्रेम है।
आज जब नई पीढ़ी धर्मवीर भारती के ‘गुनाहों का देवता’ को खोज-खोजकर पढ़ रही है, यह बताता है कि प्रेम को पढ़ने और समझने की भूख कभी खत्म नहीं होती। शायद इसी वजह से प्रेम सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली विधा है।
ऐसे में ‘जमुनापार वाली मोहब्बत’ एक अत्यंत आवश्यक और समयोचित उपन्यास बनकर उभरता है, जो नई पीढ़ी को सहज ही अपनी ओर खींच लेता है। इसका बड़ा कारण यह है कि त्रिपाठी ने प्रेम की हार-जीत और उसके भावनात्मक उतार-चढ़ाव को कई उपमानों के माध्यम से उजागर किया है, जिसमें क्रिकेट एक प्रमुख प्रतीक है। क्रिकेट इस कथा का सिर्फ़ एक प्रतीक नहीं, बल्कि वह पुल है जो छोटे शहरों की मिलेनियल संवेदनाओं को आज के पाठकों से जोड़ देता है; चाहे वो 2003 की हार हो या 2011 की जीत या 2013 का पाकिस्तान दौरा। संध्या और चंदर की प्रेमकथा, और फिर मैरी का आना, सब कुछ बड़ी सुंदरता से घटित होता है और पाठक को शानदार पठन-सुख से नवाज़ता है।
समीक्षक – मयंक जैन परिच्छा
सियासी मियार की रीपोर्ट
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