‘टाटा ट्रस्ट्स’ और ‘टाटा संस’ के बीच जारी विवाद: वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को सुलझाने का मिला जिम्मा

नई दिल्ली, एन. चंद्रशेखरन को टाटा संस का दोबारा अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद ‘टाटा ट्रस्ट्स’ और ‘टाटा संस’ के बीच जारी विवाद काफी बढ़ गया है। इस कानूनी लड़ाई के बीच टाटा ट्रस्ट्स ने अपना पक्ष रखने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को अपने साथ जोड़ा है।
कई हाई-प्रोफाइल कॉरपोरेट और संवैधानिक मामलों की पैरवी कर चुके श्री सिंघवी ने सोशल मीडिया मंच पर एक पोस्ट में कहा कि वे दिवंगत रतन टाटा के साथ अपने जुड़ाव और दोनों पक्षों के प्रमुख हितधारकों से परिचित होने के कारण “दुख और खेद” के साथ यह मामला अपने हाथ में ले रहे हैं। श्री सिंघवी ने तर्क दिया कि शेयरधारकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाया नहीं जा सकता और ऐसे अधिकारों को कमजोर करने से कॉरपोरेट गवर्नेंस पर व्यापक असर पड़ेगा।
श्री सिंघवी ने टाटा-मिस्त्री मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि न्यायालय ने टाटा संस के साथ संबंधों में हमेशा टाटा ट्रस्ट्स को प्रधानता दी है। उन्होंने कहा कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के सौ साल से भी पुराने ऐतिहासिक रिश्तों को एक-दूसरे से अलग करना अकल्पनीय है और दशकों से लागू सर्वसम्मति व वीटो के प्रावधानों की अनदेखी करना पूरी तरह अनुचित है।
गौरतलब है कि यह विवाद 17 सितंबर को टाटा संस के निदेशक मंडल के एन. चंद्रशेखरन को अगले पांच वर्षों के लिए पुनः अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद शुरू हुआ। हालांकि, टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले ‘टाटा ट्रस्ट्स’ के अध्यक्ष नोएल टाटा ने इस पुनर्नियुक्ति का कड़ा विरोध किया।
टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड के इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए इसे “कानूनी रूप से अमान्य” करार दिया है। ट्रस्ट्स का तर्क है कि चंद्रशेखरन के वर्तमान कार्यकाल के अंत में पद छोड़ने का दिया गया पूर्व निर्णय पहले ही अंतिम रूप ले चुका था। ट्रस्ट्स का कहना है कि यह निर्णय कंपनी के ‘आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन’ के अनुरूप होना चाहिए था, जबकि बोर्ड ने बहुमत के आधार पर इसे पारित कर दिया। यह मामला अब एक बड़े कॉरपोरेट गवर्नेंस और कानूनी विवाद का रूप लेता दिख रहा है।
सियासी मियार की रीपोर्ट
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