आग की लपटें..
-विनोद सिल्ला-

मैं आज सुबह
उठा और देखा
रात की बूंदाबांदी से
जम गई थी धूल,
वायुमंडल में
व्याप्त रहने वाले
धूलकण भी
थे नदारद,
मन हुआ खुश
देखकर यह सब,
कुछ देर बाद
उठाकर देखा अख़बार
तो जल रहा था वतन
साम्प्रदायिकता व
जातिवाद की आग में,
यह बरसात
नहीं कर पाई कम
इस आग को।।
(रचनाकार से साभार प्रकाशित)
सियासी मियार की रीपोर्ट
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