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उच्च शिक्षा आयोग से उम्मीद

उच्च शिक्षा आयोग से उम्मीद

-डा. वरिंदर भाटिया-

देश की उच्च शिक्षा में प्रशासनिक सुधार के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने उच्च शिक्षा के नियमन में एकीकरण लाने का निर्णय लिया है। इसके तहत यूजीसी, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद का विलय कर विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बनाया जाएगा। यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप है। इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों को बहु-विषयक शिक्षा और अनुसंधान में बदलने के लिए योजना बनाना है। कहा जा रहा है कि अलग-अलग नियामक संस्थाओं के होने से नियमों में दोहराव, देरी और भ्रम की स्थिति बनी रहती थी। नए आयोग के गठन से यह समस्या खत्म होगी। अब विश्वविद्यालय, तकनीकी संस्थान और शिक्षक शिक्षा संस्थान एक ही ढांचे के तहत संचालित होंगे। इससे फैसले तेजी से होंगे, पारदर्शिता बढ़ेगी और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आएगा। नए नियम केंद्रीय, राज्य और निजी विश्वविद्यालयों पर समान रूप से लागू होंगे। इसमें ओपन यूनिवर्सिटी, डिजिटल और ऑनलाइन शिक्षा संस्थान भी शामिल होंगे। पहले सामान्य विश्वविद्यालयों का नियमन यूजीसी करता था, तकनीकी संस्थानों के लिए एआईसीटीई जिम्मेदार था और शिक्षक शिक्षा संस्थानों के लिए एनसीटीई। अब यह पूरा काम एक ही संस्था करेगी, जिससे शिक्षा व्यवस्था सरल, स्पष्ट और प्रभावी बनेगी। उच्च शिक्षा आयोग यानी विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बन जाने के बाद देश के टीचिंग संस्थानों में सुधारों की प्रक्रिया में तेजी आएगी। नया उच्च शिक्षा आयोग बनने के बाद हर टीचिंग संस्थान के स्तर की जांच के लिए एक प्रक्रिया होगी।

वहीं हर कार्यक्रम व कोर्स में पढ़ाई का एक मिनिमम स्टैंडर्ड तय होगा। थर्ड पार्टी ऑडिट शुरू होने के साथ-साथ नियमों के खिलाफ जाकर काम करने वाले संस्थानों पर कार्रवाई भी की जा सकेगी। वहीं छात्रों को टीचिंग संस्थानों में ही नए कोर्सेज का विकल्प भी मिलेगा। उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ाने की दिशा में यह प्रयास कारगर साबित हो सकता है। उच्च शिक्षा आयोग बनने पर टीचिंग संस्थानों में अब टीचर एजुकेशन प्रोग्राम के साथ-साथ बीए, बीकॉम, बीएससी समेत स्किल एजुकेशन के दूसरे कोर्सेज भी शुरू किए जा सकेंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के मुताबिक 2030 तक सभी टीचिंग संस्थानों को बहुविषयक संस्थान बनना ही होगा, जिसके लिए यूजीसी और एनसीटीई ने गाइडलाइंस जारी की हैं। नए बिल के बाद संस्थानों में नए कोर्सेज शुरू करने आसान हो जाएगा। नए कोर्सेज के लिए मंजूरी के लिए अलग-अलग जगह आवेदन नहीं करना होगा। एक ही जगह आवेदन करने का सिस्टम लागू हो जाएगा। अभी एनसीटीई संस्थानों को मान्यता देता है, एकेडमिक स्टैंडर्ड को देखता है। इसके अलावा भी रेगुलेशंस से जुड़े कई तरह के काम होते हैं, लेकिन नए आयोग बनने के बाद एनईपी 2020 के अनुरूप टीचिंग के लिए जो प्रोफेशनल स्टैंडर्ड सेटिंग बॉडी यानी पीएसबीबी होगी, उसका काम कोर्स तैयार करना, टीचिंग के नियमों और एलिजिबिलिटी तय करना और एकेडमिक स्टैंडर्ड को देखना होगा। इससे टीचिंग की गुणवत्ता पर पूरा ध्यान दिया जा सकेगा। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान बिल के तहत कुछ विदेशी विश्वविद्यालय भारत में कैंपस खोल सकेंगे, जिनके लिए सरकार कुछ शर्तें रखेगी। इन्हें सरकारी नियमों का पालन करना जरूरी होगा। साथ ही जो विदेशी विश्वविद्यालय पहले से ही भारत में खुले हैं, उनके लिए भी नए नियम ही लागू होंगे। साथ ही बेहतर प्रदर्शन करने वाले भारतीय विश्वविद्यालयों को भी विदेश में कैंपस खोलने की अनुमति मिल सकेगी। विकसित भारत शिक्षा बिल कानून बना तो कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक जैसे नियम और काम करने का तरीका लागू हो जाएगा। नए कॉलेज खोले जाएंगे और नए कोर्स शुरू होंगे। नया सिलेबस बनाकर लागू किया जाएगा। नौकरियां पाने और स्किल्स इम्प्रूव करने वाले कोर्स की संख्या बढ़ेगी। एजुकेशन सिस्टम स्टूडेंट आधारित बनेगा। छोटे और नए कॉलेजों को समान अवसर मिलेंगे। छात्रों के लिए एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र बनाया जाएगा। यह एक अच्छा कदम ही है। इस प्रस्तावित सुधार के आलोचकों का मत है कि इससे देश के हायर एजुकेशन सिस्टम पर केंद्र सरकार का कंट्रोल हो जाएगा। कॉलेज और यूनिवर्सिटी की आजादी पर असर पड़ेगा। हायर एजुकेशन जॉब एंड स्किल बेस्ड हो जाएगी। नॉलेज और रिसर्च पर फोकस कम हो सकता है।

इन बातों में तार्किकता कमजोर है : वर्तमान उच्च शिक्षा व्यवस्था पर इस बिल का प्रभाव कैसा होगा, इसके बारे अभी कुछ सटीक नहीं कहा जा सकता है। कुछ शिक्षाविद कहते हैं कि देश की स्वतंत्रता के बाद यह आम सहमति बनी थी कि उच्च शिक्षा एक सार्वजनिक हित का क्षेत्र है, और इसी समझ के तहत यूजीसी प्रणाली का उदय हुआ। यह भी सच है कि यूजीसी में नौकरशाही जटिलताएं तथा और भी कई तरह की अक्षमताएं रही हैं, फिर भी उसकी एक वैधानिक जिम्मेदारी थी, वह केवल नियामक संस्था नहीं थी, बल्कि उच्च शिक्षण संस्थानों को अनुदान देने की बाध्यकारी भूमिका भी निभाती थी। यूजीसी एक संघीय ढांचे के भीतर काम करती थी, जिसमें राज्य विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भागीदारी सुनिश्चित थी, और वह विश्वविद्यालयों तथा प्रत्यक्ष कार्यकारी हस्तक्षेप के बीच एक सुरक्षात्मक दीवार के रूप में कार्य करती थी। इसके विपरीत, प्रस्तावित बिल उच्च शिक्षा में एक ऐसा नियामक राज्य स्थापित करता है, जिसकी कोई सार्वजनिक जवाबदेही नहीं है। इसके अलावा, कुछ शिक्षाविद कह रहे हैं कि यह सरकार द्वारा महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के निजीकरण के लिए उठाए जाने वाला कदम है। किसी भी क्षेत्र में नियामक संस्था को लाने का मतलब ही है कि उसे निजी क्षेत्र में ले जाया जा रहा है। दूसरी बात ये आयोग विश्वविद्यालयों को अनुदान नहीं देगा। विश्वविद्यालयों को कर्ज और विद्यार्थियों की फीस पर निर्भर कर दिया जाएगा। इससे गरीब और पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए उच्च शिक्षा और अधिक महंगी हो जाएगी जो कि सामाजिक न्याय और समानता पर एक गहरा आघात है। इस संशय को दूर करना जरूरी होगा। फिर भी एक बड़ी उम्मीद है कि नया उच्च शिक्षा आयोग भारत को शिक्षा के एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए भी काम करेगा, साथ ही यह भारतीय ज्ञान, भाषाओं और कलाओं को बढ़ावा देने के लिए भी काम करेगा जो कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को विकसित करने के लिए जरूरी भी है। अब देश के उच्च शिक्षण संस्थानों को मौजूदा अलग-अलग नियामक संस्थाओं के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी एवं ये शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में तत्पर हो सकेंगे। शिक्षा के क्षेत्र में नई उम्मीदें जगी हैं।

सियासी मियार की रीपोर्ट