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‘2 हफ्ते की लीग से खिलाड़ी नहीं बनते’, बाईचुंग भूटिया ने फुटबॉल सिस्टम पर उठाए गंभीर सवाल

‘2 हफ्ते की लीग से खिलाड़ी नहीं बनते’, बाईचुंग भूटिया ने फुटबॉल सिस्टम पर उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली, 17 मार्च । भारतीय फुटबॉल के दिग्गज, पूर्व कप्तान, पद्यश्री व अर्जुन अवार्डी बाईचुंग भूटिया का मानना है कि भारत में खेल प्रतिभा की कोई कमी नहीं है लेकिन मजबूत सिस्टम और संरचना की कमी के कारण खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। जब तक जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक खेल का मजबूत ढांचा तैयार नहीं होगा तब तक भारत फुटबॉल में बड़ी उपलब्धियां हासिल नहीं कर पाएगा।

‘ब्रेड्स एन बियॉन्ड नागपुर मैराथन’ को हरी झंडी दिखाने आए भूटिया ने ‘नवभारत’ से विशेष बातचीत के दौरान सिस्टम, फुटबॉल प्रतिभा और भविष्य पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि फुटबॉल को आगे बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी है ग्रासरूट स्तर पर निरंतर प्रतियोगिताएं और प्रशिक्षण व्यवस्था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि भारत में अक्सर योजनाएं शुरू तो कर दी जाती हैं लेकिन उनका प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं देता। ‘2 हफ्ते की लीग या टूर्नामेंट से खिलाड़ी नहीं बनते। खिलाड़ियों को तैयार करने के लिए लगातार कई वर्षों तक प्रतियोगिताएं और प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।’

यह कैसी नीतियां जो 3 साल में ही रैंकिंग गिरा दी?
भूटिया ने साफ कहा, ‘पिछले 3 साल में फेडरेशन की नीतियां और प्रशासन ने भारत की रैंकिंग गिरा दी। अच्छे खिलाड़ी नहीं निकल रहे। करप्शन और एलिजेशंस के आरोप सामने आए हैं, परिणाम निगेटिव है।’ उन्होंने यह भी जोड़ा कि पिछले मैनेजमेंट के समय में स्थिति बेहतर थी, पर नया प्रशासन कई मायनों में नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने भारतीय फुटबॉल टीम की गिरती रैंकिंग पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार कुछ साल पहले भारत फीफा रैंकिंग में टॉप-100 के आसपास था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह 140 के आसपास पहुंच गया है। भूटिया ने कहा कि यह स्थिति बताती है कि फुटबॉल प्रशासन और नीतियों में सुधार की जरूरत है।

ISL और ग्रासरूट का सच
भूटिया ने आईएसएल की तारीफ करते हुए चेतावनी भी दी, ‘आईएसएल केवल ऊपर के स्तर का टूर्नामेंट है। नीचे के लेवल से खिलाड़ी नहीं निकल रहे। भविष्य के खिलाड़ी केवल ग्रासरूट सिस्टम से तैयार होंगे, न कि सिर्फ सीनियर खिलाड़ियों की लीग से।’ उन्होंने जोर देकर कहा कि बच्चों को खेलने का सही वातावरण, मैदान और लगातार टूर्नामेंट मिलना चाहिए। भारत में खेलों के विकास के लिए स्पोर्ट्स कल्चर बेहद जरूरी है। यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में सप्ताहांत पर माता-पिता अपने बच्चों को खेल प्रतियोगिताओं में लेकर जाते हैं। वहां हर शनिवार-रविवार बच्चे लीग और टूर्नामेंट खेलते हैं, जबकि भारत में अधिकतर बच्चे ट्यूशन क्लास में जाते हैं, इसे बदलना होगा।’

एजुकेशन सिस्टम और अवसर की कमी
उन्होंने एजुकेशन सिस्टम की आलोचना करते हुए कहा, ‘हमारे सिस्टम में पढ़ाई इतना हाइप है कि खेलों के लिए जगह ही नहीं। अगर इसे सुधारेंगे, तभी भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकेगा। मौजूदा शिक्षा और खेल का संतुलन नहीं होने के कारण प्रतिभाशाली खिलाड़ी रास्ता बदल लेते हैं और अन्य करिअर विकल्प चुन लेते हैं। यदि स्कूल स्तर पर खेल गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए तो कई नई प्रतिभाएं सामने आ सकती हैं।’

आज खेल में भविष्य बनाया जा सकता है
भूटिया ने अपने शुरुआती संघर्ष को याद करते हुए बताया कि जब उन्होंने फुटबॉल खेलना शुरू किया था तब खेल को करिअर के रूप में चुनना आसान नहीं था। उस दौर में अधिकांश परिवार चाहते थे कि बच्चे पढ़ाई करके नौकरी करें। ‘खेल को करिअर के रूप में देखना मुश्किल था। परिवार को भी समझाना पड़ता था कि खेल में भविष्य बनाया जा सकता है। आज स्थिति पहले से बेहतर जरूरी हुई है लेकिन भारतीय खेल व्यवस्था में अभी भी कई बुनियादी कमियां बनी हुई हैं।’

बाईचुंग भूटिया कौन हैं?
बाईचुंग भूटिया भारतीय फुटबॉल के एक महान खिलाड़ी हैं, जिन्हें फुटबॉल के पोस्टर बॉय के रूप में जाना जाता है। उन्होंने भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान के रूप में कई सालों तक नेतृत्व किया और टीम को कई अहम जीत दिलवाई। बाईचुंग भूटिया 1998 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित हुए और 2008 में उन्हें पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया।

वे यूरोप में पेशेवर लीग में खेलने वाले पहले भारतीय फुटबॉलर भी हैं, जिसने भारतीय फुटबॉल को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई। आज बाईचुंग भूटिया अपनी गृह राज्य सिक्किम सहित दिल्ली, मुंबई और नाशिक में फुटबॉल के ग्रासरूट एकेडमियां चला रहे हैं, जहां वह युवा खिलाड़ियों को तैयार कर रहे हैं और उन्हें फुटबॉल में भविष्य बनाने के अवसर दे रहे हैं। उनके योगदान को भारतीय फुटबॉल में हमेशा याद किया जाएगा।

सियासी मियार की रीपोर्ट