आत्मा को कोई कैसे मारेगा
-अमित मुनि-

एक बार की बात है। महात्मा बुद्ध से उनके एक शिष्य ने धर्म-प्रचार हेतु किसी देश में जाने की आज्ञा प्रदान करने के लिए प्रार्थना की।
सोच लो वत्स! उस देश में किसी भिक्षु का रहना कोई हंसी-खेल नहीं। संतों का अपमान करने में निपुण हैं वहां के लोग। भांति-भांति से मजाक उड़ाएंगे वे तुम्हारा। गालियां देंगे तुम्हें। तथागत ने सचेत किया।
गालियां देने वाले तो बहुत दयालु होंगे भंते। कम से कम पीटेंगे तो नहीं। भिक्षु का उत्साह जरा भी कम नहीं हुआ।
वे पीट भी सकते हैं तुम्हें। तब क्या करोगे तुम? बुद्ध ने पूछा।
तब भी मैं उनका आभार मानूंगा कि अस्त्र-शस्त्रों द्वारा घायल न करके उन्होंने मुझे सिर्फ पीट कर ही छोड़ दिया। भिक्षु ने कहा।
किंतु वे तुम्हें घायल भी कर सकते हैं। तुम वहां के लोगों से परिचित नहीं। वे हड्डियां तोड़ देंगे तुम्हारी। अतः वहां जाने का विचार त्याग दो। बुद्ध ने पुनः सचेत करते हुए सुझाव दिया।
तब भी वे मुझ पर उपकार ही करेंगे भंते! मेरे प्राण नहीं लेंगे वे। भिक्षु अपने विचार के लिए पूर्णतः संकल्पित था।
वे प्राण भी ले सकते हैं वत्स! उनका कोई भरोसा नहीं। यदि तुम्हारे प्राण चले गए तो क्या होगा? बुद्ध ने कहा।
अच्छा ही होगा। धर्म-प्रचार के मार्ग पर चलते हुए प्राण जाएं, इससे उत्तम क्या हो सकता है इन नश्वर प्राणों का अर्थ! लोग तनिक-सी बात पर आत्महत्या भी कर लेते हैं। क्या मैं धर्म-कार्य हेतु अपने प्राण उत्सर्ग नहीं कर सकता? मुझे प्राणों का मोह नहीं भंते! यों भी शरीर तो मैं हूं ही नहीं। मैं तो आत्मा हूं। आत्मा को कोई कैसे मार सकता है। भिक्षु ने बुद्ध से कहा।
ठीक है वत्स! तुम उस देश जाने के लिए पूर्णतः योग्य हो। जाओ और अपनी पूर्ण साधना का आलोक उस अंधकार-ग्रस्त देश को दो। उसे आलोक की अत्यंत आवश्यकता है। तथागत का हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठ गया।
साधना द्वारा सत्य को पा लेने का अर्थ है- बाह्य परिस्थितियों से अविचलित रहना। सत्य का ज्ञान स्वभावतः साधक को धैर्य व साहस से भर देता है। दूसरों तक ज्ञान पहुंचाना तभी सार्थक होगा, जब साधक धर्म-सम्मत आचरण के माध्यम से अखंड व्यक्तित्व को पा ले।
सियासी मियार की रीपोर्ट
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