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भारतीय नौसेना में तीसरी स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिधमन जल्द होगी शामिल

भारतीय नौसेना में तीसरी स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिधमन जल्द होगी शामिल

नई दिल्ली, 22 फरवरी। भारत अपनी समुद्री सैन्य शक्ति और परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को एक नई और अभेद्य ऊंचाई पर ले जाने के लिए पूरी तरह तैयार है। देश की तीसरी स्वदेशी परमाणु-सक्षम बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (एसएसबीएन), आईएनएस अरिधमन (एस4), इस साल अप्रैल-मई तक आधिकारिक रूप से भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल होने की संभावना है। यह विकास भारत की न्यूक्लियर ट्रायड (जमीन, हवा और समुद्र से परमाणु हमले की क्षमता) को न केवल पूर्ण करता है, बल्कि देश की सेकंड स्ट्राइक क्षमता को भी अभूतपूर्व मजबूती प्रदान करता है। भारतीय नौसेना के प्रमुख एडमिरल डी.के. त्रिपाठी ने पूर्व में ही इसके 2026 में कमीशन होने के संकेत दिए थे और वर्तमान में यह पनडुब्बी अपने समुद्री परीक्षणों के अंतिम और निर्णायक चरण में है।
आईएनएस अरिधमन के नौसेना में शामिल होते ही भारत के पास इतिहास में पहली बार तीन परिचालन परमाणु पनडुब्बियां एक साथ सेवा में होंगी। यह रणनीतिक उपलब्धि भारत को कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस की उस विशिष्ट स्थिति में ले आएगी, जिसका अर्थ है कि वर्ष के 365 दिन भारत की कम से कम एक परमाणु पनडुब्बी गहरे समुद्र में गश्त पर तैनात रहेगी। यह क्षमता किसी भी शत्रु देश के दुस्साहस को रोकने के लिए सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक और सैन्य निवारक साबित होती है। एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल प्रोजेक्ट के तहत विशाखापत्तनम में निर्मित यह पनडुब्बी अपने पूर्ववर्तियों, आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात की तुलना में कहीं अधिक घातक, बड़ी और तकनीकी रूप से उन्नत है।
तकनीकी विशिष्टताओं की बात करें तो अरिधमन का कुल वजन लगभग 7,000 टन है, जो पिछली पनडुब्बियों के 6,000 टन के मुकाबले काफी अधिक है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसमें लगी के-4 बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जिनकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर तक है। इसके अतिरिक्त, यह पनडुब्बी 24 के-15 सागरिका मिसाइलों को ले जाने में भी सक्षम है, जिनकी रेंज 750 किलोमीटर है। पनडुब्बी को शक्ति प्रदान करने के लिए इसमें 83 मेगावाट का शक्तिशाली प्रेशराइज्ड वॉटर रिएक्टर लगाया गया है। दुश्मन की नजरों और सोनार से बचने के लिए इसमें उन्नत एनेकोइक टाइल्स का उपयोग किया गया है, जो पानी के भीतर इसके शोर को न्यूनतम कर देती हैं। साथ ही, बेहतर लक्ष्य पहचान के लिए इसमें भारत में ही विकसित उषस और पंचेंद्रिय जैसे अत्याधुनिक सोनार सिस्टम लगाए गए हैं। क्षेत्रीय सुरक्षा के बदलते समीकरणों के बीच भारत का यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक ओर जहां पाकिस्तान चीन से आठ उन्नत हंगोर-क्लास पनडुब्बियां हासिल कर रहा है, वहीं भारत अपनी समुद्री सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए बहुआयामी प्रयास कर रहा है। रूस से अकुला-क्लास परमाणु पनडुब्बी (चक्र-3) को लीज पर लेने और जर्मनी के साथ प्रोजेक्ट-75(1) के तहत छह अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों के निर्माण की प्रक्रिया इसी रणनीति का हिस्सा है। आईएनएस अरिधमन को चालू होने के बाद विशाखापत्तनम के पास स्थित प्रोजेक्ट वर्षा नामक एक उच्च-सुरक्षा वाले भूमिगत बेस पर तैनात किया जाएगा। यह विकास भारत को दुनिया के उन चुनिंदा शक्तिशाली देशों की कतार में मजबूती से खड़ा करता है, जो समुद्र की गहराइयों से परमाणु हमले का जवाब देने की अचूक क्षमता रखते हैं।

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