तकनीकी खराबी के कारण नासा का मानवयुक्त मून मिशन टला, हीलियम लीक ने बढ़ाईं मुश्किलें

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अपने महत्वाकांक्षी मून मिशन आर्टेमिस-2 को तकनीकी कारणों से फिलहाल टालने का निर्णय लिया है। यह मानवयुक्त मिशन आगामी मार्च महीने के लिए निर्धारित किया गया था, जिसमें अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा के करीब से होकर गुजरना था। नासा के प्रमुख जेरेड आइजैकमैन ने शनिवार को इस महत्वपूर्ण घोषणा की पुष्टि करते हुए बताया कि स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस) रॉकेट में हीलियम लीक की गंभीर समस्या पाई गई है। इस खराबी के सामने आने के बाद सुरक्षा मानकों को प्राथमिकता देते हुए रॉकेट और ओरियन अंतरिक्ष यान दोनों को लॉन्च पैड से हटा लिया गया है। अब इस मिशन की नई तारीखों का निर्धारण गहन जांच और मरम्मत के बाद ही किया जाएगा।
किसी भी रॉकेट प्रणाली में हीलियम गैस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यह प्रोपेलेंट टैंक के भीतर आवश्यक दबाव बनाए रखने का कार्य करती है, जिससे इंजन को सुचारू रूप से ईंधन मिलता है और वह संचालित होता है। हीलियम लीक होने का सीधा अर्थ मिशन की विफलता और अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा पर बड़ा जोखिम हो सकता था। इसी कारण विशेषज्ञों ने जोखिम न लेते हुए एसएलएस रॉकेट और ओरियन यान को वापस व्हीकल असेंबली बिल्डिंग में भेजने का फैसला किया है, जहां इंजीनियरिंग टीम बारीकी से इस तकनीकी खामी को दूर करने का प्रयास करेगी। नासा प्रमुख ने टीम की निराशा को स्वीकार करते हुए कहा कि 1960 के दशक के अपोलो मिशन के दौरान भी ऐसी कई बाधाएं आई थीं, लेकिन वैज्ञानिक मिशनों में जल्दबाजी के बजाय सावधानी बरतना अनिवार्य होता है।
आर्टेमिस-2 मिशन की योजना के अनुसार, अंतरिक्ष यात्रियों को शून्य-गुरुत्वाकर्षण के बीच एक संकीर्ण केबिन में रहकर इस यात्रा को पूरा करना था। इस यात्रा के दौरान उन्हें पृथ्वी की निचली कक्षा में अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के मुकाबले अधिक रेडिएशन का सामना करना पड़ता, हालांकि इसे सुरक्षित माना गया था। अपनी यात्रा पूरी कर पृथ्वी पर लौटते समय ओरियन कैप्सूल को वायुमंडल के घर्षण और तीव्र गति के कारण ऊबड़-खाबड़ लैंडिंग का अनुभव करना था, जिसके बाद इसे अमेरिकी पश्चिमी तट के पास प्रशांत महासागर में उतरना था। यह मिशन सीधे चंद्रमा की सतह पर उतरने के लिए नहीं था, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य अगले चरण आर्टेमिस-3 के लिए आधार तैयार करना था, जिसमें वास्तव में इंसानों को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतारा जाना है।
नासा का दीर्घकालिक लक्ष्य केवल चंद्रमा पर जाना ही नहीं, बल्कि वहां अपनी स्थायी उपस्थिति दर्ज कराना है। आर्टेमिस-2 के सफल होने के बाद आर्टेमिस-4 और आर्टेमिस-5 जैसे मिशनों की योजना है, जिसके तहत चंद्रमा की कक्षा में गेटवे नामक एक छोटा स्पेस स्टेशन स्थापित किया जाएगा। यह स्टेशन भविष्य के मून मिशनों और रोबोटिक रोवर के संचालन के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में कार्य करेगा। नासा ने अंतिम बार 1970 के दशक में अपोलो कार्यक्रम के जरिए चंद्रमा पर इंसान भेजे थे, और अब दशकों बाद आर्टेमिस कार्यक्रम के माध्यम से वह अंतरिक्ष अन्वेषण के एक नए और अधिक स्थायी युग की शुरुआत करना चाहता है। हालांकि, मौजूदा तकनीकी व्यवधान ने इस सफर की गति को थोड़ा धीमा जरूर कर दिया है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि इन चुनौतियों को पार करना ही अंतरिक्ष विज्ञान की असली उपलब्धि है।
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