पुस्तक समीक्षा : पहाड़ी कविताओं का सुंदर काव्य संग्रह

बिलासपुर लेखक संघ ने सांझा पहाड़ी काव्य संग्रह प्रकाशित किया है। हिम वाग्धारा नाम से निकला काव्य संग्रह पाठकों को पसंद आएगा, ऐसी उम्मीद है। इसका संकलन रवींद्र कुमार शर्मा ने किया है। क्राउन पब्लिशिंग बिलासपुर से प्रकाशित इस काव्य संग्रह की कीमत 384 रुपए है। इस संग्रह में 35 साहित्यकारों की 145 रचनाएं हैं। डा. अनेक कुमार सांख्यान ‘किसाना री जून ना पाई’ में कहते हैं, ‘गोरे-बग्गे बैलां री थी जोडिय़ां/निक्के निक्के खेतरू ही पाहडिय़ां/ना कमांदे खेता हुण अजके छोरू/पाई रे खिल्ले किस बाहणे डोहरू।’ दुखिया नामक कविता में अनीता रानी कहती हैं, ‘तिसदे अम्मा-बाबा भी रहदें थे बड़े ही दुखी/इक दिन सै दुखी होई ने जांदा अपणे के गुरू बल/गुरू बल जाइने बोलदा अनी मेरेगे नौकरी/ता रहंदा में बड़ा ही दुखी।’ निक्का जेया फौजी कर्नल जसवंत सिंह चंदेल की कविता है। इसमें फौजी की पुकार सुनिए, ‘खामखवाह मत मिंजो होरी बोलो/अऊं निक्का जेया इक फौजी आ/मिंजो खुसी मिलणी जे फौजी बोलो/खामखवाह मत मिंजो हीरो बोलो।’ केशव शर्मा की कविता है ‘असा हिमाचलियां जो बड़ा खरा लगदा’। इसका भाव देखिए, ‘पहाड़ी गाणेयां पर सारेयां मिली कने नचणा/ब्याहां च पहाड़ी धामां रा स्वाद चखणा/अपणे भाईचारे कन्ने मिली के चलणा/असां हिमाचलियां जो बड़ा खरगा लगदा।’ कविता सिसोदिया की कविता है बंदेया तू कजो हुआं दुखी। इसका भाव देखिए, ‘मानस योनि तिजो मिलूरी/तिसारी तू कीमत जाण/गुजारा तेरा बंदेया चलूरा/पर बड्डा मुंह काजो बाकूरा/टबरा कने मौज मना/भगवाना रा नांव जपदा जा/तेरे लालचा रा ता अंत नी हुणा/तेरा आपणा अंत आई जाणा/फेरी ते बौहत पछताणा।’ संग्रह की अन्य कविताओं में भी विविध भावों की अभिव्यक्ति हुई है। ऐसा साझा प्रयास प्रशंसा योग्य है।
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