मकर संक्रांति (14 जनवरी) पर विशेष: तिल-गुड़ की मिठास में बसा सूर्य पर्व है ‘मकर संक्रांति’
-योगेश कुमार गोयल-

मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का ऐसा प्राचीन पर्व है, जिसकी जड़ें केवल धार्मिक आस्था में ही नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, खगोल विज्ञान और लोकजीवन की गहरी समझ में भी समाई हुई हैं। यह पर्व मूलतः सूर्य उपासना का उत्सव है, जिसे प्रतिवर्ष 14 या 15 जनवरी को पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ भारत सहित अनेक देशों में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। मकर संक्रांति का महत्व इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि यह पर्व किसी पौराणिक कथा तक सीमित न होकर खगोलीय घटना से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। इसी दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है और अपनी उत्तरायण यात्रा आरंभ करता है, जिसे अंधकार से प्रकाश की ओर, निराशा से आशा की ओर और जड़ता से चेतना की ओर संक्रमण का प्रतीक माना गया है। इस वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जा रही है।
मकर संक्रांति केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन का सजीव संकेत भी है। इसी दिन से वसंत ऋतु के आगमन की आहट मिलने लगती है। खरीफ की फसलें घरों तक पहुंच चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहाने लगती हैं। सरसों के पीले फूल खेतों में प्रकृति की मुस्कान बिखेरते हैं और किसान के श्रम का प्रतिफल उसकी आंखों के सामने साकार होने लगता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को देशभर में फसलों के आगमन और कृषि समृद्धि के पर्व के रूप में भी देखा जाता है। यह उत्सव किसान के लिए आशा, संतोष और भविष्य की संभावनाओं का प्रतीक बन जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन सूर्य देव अपने सात घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यह परिवर्तन केवल खगोलीय नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनिदेव से वर्षों पुरानी नाराजगी भुलाकर उनके घर गए थे, इसलिए यह पर्व पारिवारिक समरसता, क्षमा और संबंधों की पुनर्स्थापना का संदेश भी देता है। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए इसी दिन तर्पण किया था, जिससे इस तिथि को पितृ तर्पण और पुण्यकर्म से भी जोड़ा गया।
खगोल विज्ञान की दृष्टि से मकर संक्रांति का महत्व अत्यंत वैज्ञानिक है। पृथ्वी की गोलाकार संरचना और उसके अक्ष पर झुके हुए भ्रमण के कारण दिन और रात की अवधि में परिवर्तन होता है। जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर बढ़ता है, तब उत्तरी गोलार्द्ध में दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं। लोकभाषा में कहा जाता है कि मकर संक्रांति से दिन ‘तिल-तिल’ बढ़ता है। दिन की अवधि बढ़ने से खेतों में बोए गए बीजों को अधिक प्रकाश, ऊष्मा और ऊर्जा मिलती है, जिससे फसलों की वृद्धि बेहतर होती है। यही कारण है कि यह पर्व किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है और कृषि आधारित भारतीय समाज में इसका गहरा स्थान है। ‘मकर’ शब्द जहां मकर राशि की ओर संकेत करता है, वहीं ‘संक्रांति’ का शाब्दिक अर्थ है-संक्रमण या प्रवेश। सूर्य जब एक राशि को छोड़कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उस खगोलीय घटना को संक्रांति कहा जाता है। सूर्य वर्षभर में कुल बारह राशियों में क्रमशः प्रवेश करता है, परंतु मकर संक्रांति को सबसे महत्वपूर्ण इसलिए माना गया है क्योंकि यह उत्तरायण का प्रारंभ बिंदु है। भारतीय परंपरा में उत्तरायण काल को अत्यंत शुभ माना गया है। महाभारत में भी भीष्म पितामह ने उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हुए देह त्याग किया था, जिससे इस काल की पुण्यता और अधिक स्थापित होती है।
मकर संक्रांति की एक विशिष्ट विशेषता यह भी है कि यह भारत का ऐसा पर्व है, जो लगभग पूरे देश में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है, हालांकि इसके नाम, परंपराएं और स्वरूप क्षेत्र विशेष के अनुसार बदल जाते हैं। उत्तर भारत में यह पर्व कहीं लोहड़ी, कहीं खिचड़ी, कहीं माघी तो कहीं पतंगोत्सव के रूप में मनाया जाता है। मध्य भारत में इसे सामान्यतः संक्रांति कहा जाता है, जबकि दक्षिण भारत में यही पर्व ‘पोंगल’ के रूप में महापर्व का दर्जा रखता है। कहीं इसे उत्तरायण कहा जाता है तो कहीं पौष संक्रांति। असम में यह भोगाली बिहू या माघ बिहू कहलाता है, तो बंगाल में पौष संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। भारत की सीमाओं से बाहर भी मकर संक्रांति का सांस्कृतिक विस्तार देखने को मिलता है। नेपाल में यह माघे संक्रांति या खिचड़ी संक्रांति के रूप में मनाई जाती है। श्रीलंका में इसे पोंगल या उझवर तिरूनल कहा जाता है। बांग्लादेश में पौष संक्रांति, थाईलैंड में सोंगकरन, म्यांमार में थिंयान, कंबोडिया में मोहा संगक्रान और लाओस में पि मा लाओ के नाम से यह पर्व मनाया जाता है। यह तथ्य दर्शाता है कि सूर्य, ऋतु और कृषि से जुड़ा यह पर्व सीमाओं से परे मानव सभ्यता का साझा उत्सव है।
हिन्दू शास्त्रों में मकर संक्रांति को अत्यंत पुण्यदायी पर्व माना गया है। इस दिन तीर्थ स्नान, दान, जप और श्राद्धकर्म को विशेष फलदायी कहा गया है। गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा जैसी पवित्र नदियों के तटों पर लाखों श्रद्धालु इस दिन स्नान के लिए एकत्र होते हैं। गंगासागर में मकर संक्रांति पर लगने वाला मेला इस पर्व की विराटता और आस्था की गहराई का जीवंत उदाहरण है। कहा जाता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से न केवल आध्यात्मिक शुद्धि होती है, बल्कि मानसिक और शारीरिक ऊर्जा भी प्राप्त होती है। मकर संक्रांति पर तिल का विशेष महत्व है। तिल को शुद्धता, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इस दिन तिल-गुड़ से बने व्यंजनों का सेवन और दान करने की परंपरा लगभग पूरे देश में देखने को मिलती है। माना जाता है कि तिल और गुड़ शरीर को ऊष्मा प्रदान करते हैं और शीत ऋतु में स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं। यही कारण है कि इस पर्व पर ‘तिल-गुड़ लो और मीठा बोलो’ जैसी लोक कहावतें सामाजिक सौहार्द और आपसी संबंधों में मधुरता का संदेश देती हैं।
मकर संक्रांति का एक लोकप्रिय स्वरूप पतंगोत्सव के रूप में भी सामने आता है। उत्तर भारत और पश्चिमी भारत के कई हिस्सों में इस दिन आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। पतंग उड़ाना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-जोल और स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है। कड़ाके की ठंड के मौसम में खुले आकाश के नीचे कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना शरीर के लिए लाभकारी माना जाता है। यह परंपरा अनजाने में ही सूर्य स्नान का रूप ले लेती है, जिससे त्वचा, हड्डियों और संपूर्ण स्वास्थ्य को लाभ पहुंचता है। इस प्रकार मकर संक्रांति केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन का उत्सव है। यह पर्व हमें सूर्य के महत्व, कृषि के मूल्य, सामाजिक सौहार्द और सकारात्मक जीवन दृष्टि का बोध कराता है। विविधताओं से भरे भारतीय समाज में मकर संक्रांति एक ऐसा सूत्र है, जो विभिन्न भाषाओं, परंपराओं और संस्कृतियों को एक साझा भाव में बांध देता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता और स्थायी प्रासंगिकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा 36 वर्षों से साहित्य व पत्रकारिता में सक्रिय हैं)
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