मनोभावों का दर्पण है हमारा चेहरा

किसी ने ठीक ही कहा है कि भ्रांतियां मनुष्य की स्वनिर्मित और स्वनिर्धारित हैं, जिनमें वह एक को भला और दूसरे को बुरा बताता है, अन्यथा सृष्टा की हर संरचना अपने में विशिष्टता धारण किए हुए है। मुनष्य ही है, जो जिसके साथ चाहता है, प्रभावित होकर अपनत्व बढ़ाता, घनिष्ठता जोड़ता और राग-द्वेष का आरोपण कर लेता है, घृणा या प्रेम करता है, जबकि वस्तुतः ऐसा है नहीं। सभी प्राणी एवं वस्तुएं नियति नटी के किसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए रची गई हैं। उनकी अपनी-अपनी विशिष्टता एवं महत्ता है। यही तथ्य मनुष्य पर भी लागू होता है। दृष्टिकोण का परिवर्तन मनःस्थिति को भी बदलकर रख देता है। मान्यताओं के बदलते ही घृणा के स्थान पर प्रेम की रसानुभूति होते देर नहीं लगती।
सर्वत्र दृष्टिगोचर होने वाली व्यथाओं का कारण मनुष्य की अपनी स्वनिर्मित मान्यताएं ही हैं। किन वस्तुओं या व्यक्तियों के प्रति, किसी का राग-द्वेष, कितनी प्रगाढ़ता लिए हुए है, उसके चेहरे पर या आंखों में झांकने पर इसकी स्पष्ट झांकी हो सकती है। कारण मन की प्रसन्नता-अप्रसन्नता, प्रियता-अप्रियता व्यक्त करने के यही दोनों दर्पण की भूमिका निभाते हैं। यह अपने हाव-भाव के पीछे गूढ़ रहस्य जो छिपाए बैठे होते हैं। मनोविज्ञानी इस तथ्य को भलीभांति जानते हैं और कहते हैं कि मन और शरीर सहजीवी की तरह हैं। एक का दूसरे के साथ बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है और दोनों मिलकर चेहरे पर प्रसन्नता या दुःख की झलकियां प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि मनोचिकित्सक चेहरा देखते ही भांप जाते हैं कि व्यक्ति किस व्यथा से पीड़ित है।
विकृत दृष्टिकोण धीरे-धीरे मन को अपनी गिरफ्त में पूरी तरह जकड़ लेता है और उसे तनावग्रस्त बना देता है। इसका प्रभाव सौंदर्य पर भी पड़ता है और स्थूल रूप से स्वस्थ दिखते हुए भी व्यक्ति कुरूप लगने लगता है। विषाक्त प्रवृत्ति को ढंकने का प्रयत्न करती है, फलस्वरूप व्यक्ति बाह्य जगत में कृत्रिम चेहरा बनाने का प्रयत्न करता है, कि तनावयुक्त मांसपेशियां विशेष प्रकार की स्थिति से ग्रस्त होकर कठोर बन गई हैं। ओंठ एवं तनी भौंहें अंततः यही सिध्द करती हैं कि व्यक्ति किन्हीं विशेष मनःस्थितियों में उलझा है।
ईष्या, द्वेष एवं घृणा की स्थिति में मन के धरातल में कंपन शीघ्र होने से नए-नए कुविचार शीघ्रता से उठते हैं, जबकि शांत एवं स्थिर मन तटस्थ चिंतन करता है। ऐसी स्थिति में भावनाएं, विचारणाएं सात्विक ढंग से निस्सृत होती हैं और उनका आरोपण जिस किसी पर भी होगा, उसी में अपनत्व भरी तरंगों का प्रवाह प्रस्फुटित होने लगेगा। ऐसी दशा में स्वयं को प्रसन्नता होती है, स्नायुमंडल को विश्राम मिलता है और विरोधी आकांक्षाएं-भावनाएं मिटती हैं। मन एवं उसकी शक्तियों का बिखराव भी रुकता है। यही शक्तियां मूलस्रोत पर पहुंचकर घनीभूत होती और तन-मन को स्वस्थ बनाती हैं।
चिंता एवं घृणा से मुक्त मन घनीभूत शक्तियों सहित अनंत चेतनसत्ता से, विराट ब्रह्म से जुड़कर व्यापक प्रेम की अनुभूति कराने में सक्षम हो जाता है। इससे मनोभावनाएं शुध्द-पवित्र तो बनती ही हैं, समूचा व्यक्तित्व भी प्रभावित-परिवर्तित हुए बिना नहीं रहता। यही क्रिया अंतराल को देवत्व स्तर का बना देती है। वस्तुतः इस संसार में कोई भी वस्तु या व्यक्ति असुंदर नहीं। सृष्टा की इस धरती पर कुछ भी कुरूप नहीं है। हम जिससे घृणा करने लगते हैं, वही हमारे लिए असुंदर बन जाता है। यदि अपना दृष्टिकोण बदलकर आत्मीयता-अपनत्व का प्रकाश डालें और सृष्टि के सौंदर्य को सराहें, उसकी उपयोगिता पर ध्यान दें, तो ऐसा मानसिक कायाकल्प हो सकता है, जिसके कारण विश्व में कहीं भी कुरूपता दृष्टगोचर न हो।
(युग निर्माण योजना)
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