बसंत पंचमी (23 जनवरी) पर विशेष: ज्ञान और वैराग्य का पर्व है वसन्त पंचमी
-कांतिलाल मांडोत-

धर्म, इतिहास और संस्कृति-तीनों मनुष्य जीवन के चित्र में हरे, लाल, पीले रंगों की तरह गहरे घुले-मिले तत्त्व हैं, यद्यपि इनमें तीनों के रंग अलग-अलग हैं। फिर भी इनकी पहचान करने में हम भूल कर सकते हैं, परन्तु पहचान करना कठिन नहीं है।
धर्म वह शाश्वत तत्त्व है, जो अनादिकाल से मनुष्य के जीवन में आनन्द, सुख और शान्ति का कल्पवृक्ष बनकर लहरा रहा है। धर्म मानव की आन्तरिक चेतना की उपज है, आन्तरिक चेतना से ही उसका सीधा सम्बन्ध है। दया, करुणा, प्रेम, सद्भाव एक-दूसरे के प्रति निःस्वार्थ समर्पण, भौतिक इच्छाओं पर विवेक का अंकुश, सद्-असद् का विवेक और उसके अनुरूप आचरण-यह सब धर्म का रूप है। धर्म हमारी चेतना को ऊर्ध्वमुखी बनाता है, धर्म से ही मन में विराटता और भावों में पवित्रता की प्राणधारा संचरित होती है।
इतिहास एक बीता हुआ सत्य है, भोगा हुआ अतीत है। मनुष्य ने भला-बुरा, सद्-असद् जो कुछ भी किया है, प्रेम और युद्ध, निर्माण और विध्वंस, उद्दाम इच्छाओं का खुला खेल अथवा किसी की रक्षा के लिए अपना बलिदान यह सब इतिहास के पृष्ठों पर अंकित है। इतिहास का रंग लाल और पीला है। जो मानव के द्वारा खेले गये खूनी खेल और किये गये निर्माणों का प्रतीक है। इतिहास मनुष्य की मूर्खता और समझदारी का जीता-जागता दस्तावेज होता है। वह दर्पण है, जिसमें मानव जाति का अतीत प्रतिबिम्बित है।
संस्कृति हरे, पीले, लाल, सफेद फूलों का एक गुलदस्ता है। यह मनुष्य की उस जीवन धारा को सूचित करती है, जिसमें वह बह रहा है, बहता रहा है। उसकी मानसिक रुचियाँ, सुख-दुःख की संवेदनाएँ, खेलकूद, आमोद-प्रमोद की अभिव्यक्तियाँ, अतीत के प्रति जुड़ा अनुराग और भविष्य के प्रति जगे सपने, आशाएँ, अपेक्षाएँ जहाँ, जिस रूप में अभिव्यक्त होती हैं, वह है संस्कृति।
संस्कृति एक प्रवाह है, जो निरन्तर गतिशील भी है, परिवर्तनशील भी है। देश, काल, समाज की परिस्थितियों के अनुसार संस्कृति बदलती रहती है। वातावरण, सम्पर्क और वैचारिक आदान-प्रदान से भी संस्कृति में संस्कार या विकार आते रहते हैं। संस्कृति की तस्वीर में इतिहास और धर्म दोनों ही अपना-अपना रंग लिए रहते हैं। इसलिए संस्कृति कभी सभ्यता, कभी रीति-रिवाजों और कभी पर्व-त्यौहारों के रूप में भी प्रकट होती रहती है।संस्कृति जीवन का अंग है।
भारतीय संस्कृति की एक विशेषता है कि उसमें समाज और धर्म का प्रतिविम्ब एक साथ समाया रहता है। संस्कृति हमेशा ही मानव सभ्यता को विकास और विराटता की ओर ले जाती है। इसलिए हम संस्कृति को जीवन से अलग नहीं कर सकते। मानव-जीवन का एक पहलू धर्म से जुड़ा है तो दूसरा पहलू संस्कृति से जुड़ा हुआ है। पर्व, त्यौहार, उत्सव आदि सभी हमारी सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। संस्कृति के पवित्र सन्देशों को घर-घर और जन-जन तक पहुँचाने वाले दूत हैं-पर्व।
आज वसन्त पंचमी का पर्व है, चारों ओर नये पीले केसरिया कपड़े नजर आ रहे हैं। लाउडस्पीकरों पर धुन गूँज रही है-मेरा रंग दे वसन्ती चोला। खेत-खलिहान सरसों के पीले-पीले फूलों की शोभा लिए दूर-दूर तक चमक रहे हैं। ऐसा लग रहा है, मानो प्रकृति ने फूलों के बहाने खेतों में सोना फैला दिया है और खेतों की स्वर्णिम आभा देखकर किसान का कोमल मन नाच रहा है। किसान के पसीने की बूँदें ही मानो स्वर्ण-फूल बनकर धरती के अंचल में दमक रही हैं। वसन्त ऋतु की यह सुहावनी छटा कुछ अलौकिक है। बड़ी जीवनदायिनी, आनन्द की वर्षा करने वाली और मन को प्रफुल्लता देने वाली है।
वसन्त निर्माण का प्रतीक है
पतझड़ के बाद वसन्त ऋतु का आगमन नव-निर्माण का प्रतीक है। विनाश के बाद नये विकास की सूचना लेकर वसन्त ऋतु आती है। जर्जर, मृतप्रायः प्राकृतिक वनस्पतियों में नव-जीवन अँगड़ाई लेने लगता है। सूखे वृक्षों पर नई-नई कोपलें लगती हैं। मुर्झये पौधों पर जैसे जीवन खेलने लगता है। सर्वत्र उल्लास उमड़ रहा है। इस अलौकिक शोभा के कारण ही वसन्त ऋतु को सब ऋतुओं से श्रेष्ठ और ऋतुराज कहा जाता है। गीता में विद्या या सरस्वती का अवतरण दिवस
यों तो बसन्त पंचमी एक ऋतु-परिवर्तन का पर्व है। प्राकृतिक जीवन में नव उत्साह और नई उमंग के संचार का त्यौहार है। किन्तु भारत के प्राचीन ऋषि-मनीषियों ने इस पर्व को विद्या की देवी सरस्वती के साथ जोड़ दिया है।और वैदिक पुराणों की कथा के अनुसार आज के दिन विद्या देवता सरस्वती का धरा पर अवतरण हुआ था। अर्थात् आदिमानव ने आज के दिन अक्षर ज्ञान का अभ्यास करना प्रारम्भ कर दिया था। मनुष्य ने वर्णमाला और लिपिविद्या का ज्ञान सीखना आज के दिन प्रारम्भ किया था। इसलिए वसन्त पंचमी को विद्या देवता के अवतरण का दिन माना गया है।
बसन्त पंचमी, काम-पूजा नहीं, काम-विजय का पर्व है
इतिहासकारों का कहना है-प्राचीनकाल में भारत के गुरुकुलों में हजारों विद्यार्थी गुरुओं के चरणों में बैठकर विद्याध्ययन किया करते थे और अपने जीवन को सत्यं, शिवं, सुन्दरम् से जोड़ते थे। सबसे पहले सत्य का ज्ञान प्राप्त करते थे। फिर शिवं-कल्याण का मार्ग पहचानते थे। उसके बाद सौन्दर्य-कला-कौशल सीखते थे। परन्तु जब से भारत में वाम मार्ग का प्रभाव बढ़ा तो सत्यं, शिवं के स्थान पर केवल सुन्दर को महत्त्व दिया जाने लगा और लोग सरस्वती-पूजा छोड़कर कामदेव की पूजा करने लगे। वसन्त पंचमी के पवित्र पर्व पर सरस्वती-पूजा के स्थान पर मदन-महोत्सव मनाया जाने लगा। इसी कारण भारत में ज्ञान-विज्ञान का ह्रास हुआ और आचार-विचार में गिरावट आई। चरित्र का पतन हुआ। भारत के गुरुकुलों में जहाँ अन्य देशों से सैकड़ों, हजारों छात्र पढ़ने के लिए आते थे, ज्ञान प्राप्त करने आते थे। आज वहाँ भारत के छात्र ज्ञान प्राप्त करने विदेशों में जा रहे हैं। ज्ञान का, विद्या का यह ह्रास-पतन क्यों हुआ ? इसका कारण है कि सरस्वती के स्थान पर काम को महत्त्व दिया जाने लगा। सत्य के स्थान पर केवल सुन्दर की पूजा होने लगी।
यह सही है कि वसन्त ऋतु प्रफुल्लता की ऋतु है। प्रकृति की सुषमा अपने पूर्ण विकास में निखरती है। रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं। न अधिक सर्दी, न अधिक गर्मी यह सब बातें मनुष्य के मन में भावनात्मक परिवर्तन मदन-पूजा या मदन-दहन।
वसन्त पंचमी के कुछ दिन बाद महाशिवरात्रि का पर्व आता है। भारतीय संस्कृति पर शोध करने वालों का अनुमान है कि वसन्त पंचमी और महाशिवरात्रि का परस्पर सम्बन्ध है। वे इस पर्व को मदन-पूजा की जगह कुमारसंभव में वर्णित मदन-दहन अर्थात् काम-विजय का पर्व मानते हैं। इसकी पौराणिक कथा इस प्रकार है कि पार्वती ने शिव को पतिरूप में पाने का संकल्प किया। पार्वती को अपने अद्भुत सौन्दर्य का गर्व था। वह सोचती थी अपने रूप-सौन्दर्य, हाव-भाव द्वारा वह शिव की तपश्चर्या भंग करके उन्हें मोह-मुग्ध कर लेगी। हिमालय के देवदारू वन में जहाँ शिव अखण्ड तप में लीन थे, पार्वती वहाँ पहुँची, सहायता के लिए कामदेव को उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। यह जैन संस्कृति का ही नहीं, अपितु वैदिक संस्कृति का भी स्वर है जो हमें तप का महत्त्व बताता है।
वसन्त पंचमी के साथ काम-पूजा का सम्बन्ध वास्तव में वाममार्ग की कुत्सित धारणा का चिह्न है, वास्तव में तो यह पर्व शिवशंकर की काम-विजय का पर्व है। पहले ज्ञान-पूजा करो, ज्ञान प्राप्त करो, फिर ज्ञान के द्वारा वैराग्य अर्थात् वीतराग भाव की प्राप्ति करो। इस प्रकार वसन्त पंचमी भारतीय संस्कृति का अध्यात्मोन्मुखी पर्व है और भगवान महावीर के इस सन्देश को चरितार्थ करती है। अज्ञान और मोह का नाश होने पर सम्पूर्ण ज्ञान का आलोक प्राप्त होता है और ज्ञान द्वारा मनुष्य मोह पर विजय प्राप्त कर वीतराग बनता है। वसन्त पंचमी का यही सन्देश आज आपके लिए है।
(वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार)
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है)
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