देश में गहराते एलपीजी संकट के बीच ‘केरोसिन युग’ की वापसी
-₹400 वाला पुराना स्टोव अब ₹5000 में बिक रहा, गया के बाजारों से स्टॉक पूरी तरह खत्म

नई दिल्ली, 03 अप्रैल ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध के चलते वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होने से भारत में एलपीजी का संकट गहरा गया है। उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों सहित आम नागरिकों को समय पर गैस सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है, जिससे केंद्र सरकार ने केरोसिन (मिट्टी तेल) के नियमों में 60 दिनों की ढील दी है। अब पीडीएस का केरोसिन पेट्रोल पंपों पर भी उपलब्ध होगा। गया जिले में जिला सप्लाई कार्यालय ने 1,44,000 लीटर केरोसिन स्टॉक करने के आदेश दिए हैं। इस बदलाव के कारण ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की रसोई फिर से स्टोव, लालटेन और पेट्रोमेक्स की ओर शिफ्ट हो रही है, जिससे पुराने दौर की यादें ताजा हो गई हैं।
केरोसिन की उपलब्धता बढ़ते ही बाजार में स्टोव की मांग में अप्रत्याशित उछाल आया है। गया के रमना रोड जैसे बड़े बाजारों से स्टोव पूरी तरह आउट ऑफ स्टॉक हो चुके हैं। दुकानदारों का कहना है कि 2015 के बाद मैन्युफैक्चरिंग बंद होने के कारण नया स्टॉक नहीं आ रहा है। जो स्टोव पहले 400 से 600 रुपये में मिलते थे, उनकी कीमत अब 3000 से 5000 रुपये तक पहुँच गई है। लोग अपने कबाड़ में रखे पुराने स्टोव निकालकर मरम्मत के लिए मिस्त्रियों के पास पहुँच रहे हैं, लेकिन स्पेयर पार्ट्स और पिन की कमी के कारण मरम्मत भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। विकल्प के तौर पर लोग अब कोयले वाले स्टील चूल्हों और हीटरों की तलाश कर रहे हैं।
स्टोव के बढ़ते चलन पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कड़ी चेतावनी जारी की है। डॉ. संजय प्रसाद के अनुसार, केरोसिन जलाने से निकलने वाला कार्बन मोनोऑक्साइड और कालिख फेफड़ों के लिए अत्यंत हानिकारक है। इससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और निमोनिया जैसी सांस की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, विशेषकर उन महिलाओं के लिए जो बंद किचन में खाना बनाती हैं। प्रोफेसर तनवीर आलम ने इसे एक “पिछड़ा कदम” करार दिया है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि मजबूरी में स्टोव का उपयोग करना पड़े, तो वेंटिलेशन का विशेष ध्यान रखें। फिलहाल, महंगाई और किल्लत के बीच आम आदमी स्वास्थ्य जोखिमों को ताक पर रखकर पेट भरने के लिए स्टोव और लकड़ी का सहारा ले रहा है।
सियासी मियार की रीपोर्ट
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