एक भी आंसू न कर बेकार
-रामावतार त्यागी-

एक भी आंसू न कर बेकार –
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!
पास प्यासे के कुआं आता नहीं है,
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है,
और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहां प्राणी नहीं है,
कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौनसा भा जाए!
चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण
किन्तु आकृतियां कभी टूटी नहीं हैं,
आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ-
पर समस्याएं कभी रूठी नहीं हैं,
हर छलकते अश्रु को कर प्यार
जाने आत्मा को कौन सा नहला जाए!
व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की,
काम अपने पांव ही आते सफर में,
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा-
जो स्वयं गिर जाए अपनी ही नजर में,
हर लहर का कर प्रणय स्वीकार-
जाने कौन तट के पास पहुंचा जाए!
‘सियासी मियार की रीपोर्ट
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