तूने बनाया जख्मी
-ललित साहू-

तेरी आरजू लिए जी रहा हूं
तेरी आरजू लिए ही मर जाऊंगा
मेरी रुह भी ढूंढेगी सिर्फ तुझे
पर शायद ही मैं याद तुझे आऊंगा
मेरे हंसी ख्वाब जो तूने छिने
मैं वापस उसे कहां से लाऊंगा
मिट्टी का घर तोडा महल के लिये
मैं यादें किस मुंडेर अब बसाऊंगा
महफिलें छोडी मैंने ये सोचकर
खुशियों में गम मैं कैसे फैलाऊंगा
जिस गम का बोझ है मेरे नसीब में
किसी और को मैं क्या बताऊंगा
आज इतरा ले भले ही अपने हुस्न पे
खूबसूरती दिल की कभी दिखाऊंगा
कभी तो आयगी झुर्रियां चेहरे पर
उस वक्त भी तुझे मैं अपनाऊंगा
जा मुझसे दूर, बहुत दूर चली जा
पर मैं तो तुम्हें भुला ना पाऊंगा
मैंने तो कलम से यारी कर ही ली है
अपने जख्मों से मैं कविता बनाऊंगा
कभी थको तो मुड़ के देख लेना
मैं तुम्हारे पीछे खडा ही मिल जाऊंगा
तेरा दिया जख्म इस कदर भाया मुझे
कि मैंने ठाना अब जख्मी ही कहलाऊंगा।।
सियासी मियार की रीपोर्ट
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