प्रेरक प्रसंग: महिलाओं को मताधिकार

एमेलाइन को बचपन से ही राजनीति का बहुत शौक था। उनके माता-पिता स्वयं तो राजनीति में सक्रिय थे, लेकिन चाहते थे कि उनकी बेटी राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश न करे। उसके लिए उन्हें आम महिला का जीवन ही ठीक लगता था। पर एमेलाइन आठ वर्ष की उम्र में ही नारी-मताधिकार आंदोलन से जुड़ गईं। वह ब्रिटेन में मताधिकार पर नारियों के हक की आवाज बुलंद करने लगीं। 20 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हुआ। उन्होंने विमिंस फ्रैंचाइजी लीग की स्थापना की और महिला मताधिकार के लिए अपना आंदोलन तेज कर दिया।
मैंचेस्टर में गरीबी तो थी ही, वह गरीबों के विकास के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ने लगीं। सन 1903 में उन्होंने एक मुखर विमिंस सोशल एंड पॉलिटिकल यूनियन का गठन कर लिया। इस संगठन की महिलाएं उग्र प्रदर्शन करती थीं ताकि लोगों और सरकार का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट हो। वे भूख-हड़ताल पर बैठतीं तो उन्हें जबर्दस्ती खिला-पिला दिया जाता। अक्सर उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया जाता। 1912 में तो प्रदर्शन के दौरान खिड़कियां तोड़ने के आरोप में ही एमेलाइन को जेल भेज दिया गया।
1914 में पहला विश्वयुद्ध छिड़ गया। महिला आंदोलन अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया। सरकार ने एमेलाइन सहित सभी आंदोलनकारियों को रिहा कर दिया। सारे पुरुष लड़ने चले गए तो पुरुषों के लिए आरक्षित काम महिलाएं करने लगीं। एमेलाइन महिला मताधिकार में बराबरी के लिए संघर्ष करती रहीं। 1918 में 30 साल से अधिक की महिलाओं को मताधिकार व 2 जुलाई 1928 को महिलाओं को पुरुषों के समान 21 वर्ष की आयु में वोट डालने का अधिकार भी मिल गया। लेकिन इससे दो सप्ताह पहले 14 जून 1928 को एमेलाइन का निधन हो गया।
सियासी मियार की रीपोर्ट
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