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कविता : चक्रव्यूह के पार..

कविता : चक्रव्यूह के पार..

-ललित मोहन शर्मा-

मनों में उभरते अंतर व
विभाजन विभीषिका के
निरंतर स्मरण के रहते
विक्षिप्त ही होगी स्मृति!

स्वतंत्र हो पाने की ललक
या गहरी तड़पती उत्कंठा
सहज स्वभाव में उलझती
और पनपती एक विसंगति।

इतिहास के कोलाहल में कैद
तंग दायरों में भटकता आदमी
कभी भी प्रतिघात कर सकता
या पाता स्वयं को घुटे पलों में
जब आत्मघात सहज लगता।

लपक कूद कर दूर निकलना
इतिहास के चक्रव्यूह के पार
तभी आज देख पाए भविष्य
कल के रास्ते उजागर हो पाएं।

विध्वंस के दृश्य भयंकर और
विकराल निगल जाएं व्यक्ति,
उसकी सोच व दृष्टि के गुण,
भ्रम के मर्म समझता विवेक।

सियासी मियार की रीपोर्ट