घायल पांखे

-जावेद उस्मानी-
धुंधली आंखे
घायल पांखे
अब और बसेरा कितनी दूर
बचकर
चुगती थी
दानो को संयम से
निर्दोष श्रम से
जाने कैसे हो गयी फिर भी
घायल पांखे
और उस पर बसेरा कितनी दूर
बाट तकें नन्ही आंखे
कुछ आशा से
कुछ अभिलाषा से
और यहां हो गयी मां की घायल पांखे
अब और बसेरा कितनी दूर
सूरज ठहरे जो
कुछ पल और
अंको में छुपा लेती
भूखे तन को दुलारा लेती
घायल पांखे
बस और बसेरा कितनी दूर।।
(साभार: प्रवक्ता डाॅट काॅम)
सियासी मियार की रीपोर्ट
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