सूक्षम, छोटै-मझोले उद्यमों के लिए कर्ज की कमी 2030 तक 55 लाख करोड़ रु. से भी अधिक रहने का अनुमान

नई दिल्ली, 05 अप्रैल। देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएसमई क्षेत्र की इकाइयां) का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में योगदान 33 प्रतिशत से बढ़ कर 40 प्रतिशत तक पहुंच सकता है लेकिन इस क्षेत्र के लिए संगठित क्षेत्र से मिलने वाला वित्त पोषण इसकी कुल आवश्यकता से 33 प्रतिशत कम रहने का अनुमान है।
विश्लेषण फर्म बी2के एनालिटिक्स की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र को 2030 तक 162.92 लाख करोड़ रुपये के वित्त पोषण की जरूरत होगी और इस अवधि में इस क्षेत्र को औपचारिक स्रोतों से कर्ज 78.02 लाख करोड़ रुपये तक उपलब्ध हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार इसमें 56.98 लाख करोड़ रुपये का कर्ज प्राथमिकता क्षेत्र की ऋण सुविधाओं के तहत 18.57 लाख करोड़ रुपये अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों से और 2.46 लाख करोड़ रुपये गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) से मिलने का अनुमान है। इसके अतिरिक्त ये इकाइयां 5 कर्ज की व्यवस्था अनौपचारिक स्रोतों से कर सकती है तथा कर्ज की लगभग 30 प्रतिशत व्यवस्था प्रवर्तक अपनी खुद की पूंजी से करेंगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके बावजूद 2030 तक एमएसएमई के लिए कर्ज की कमी 55.18 लाख करोड़ रुपये के विशाल स्तर तक रहने का अनुमान है।
बी2के एलालिटिक्स के सीईओ रिताबन बसु के अनुसार, ” हमारे अनुमान एमएसएमई के योगदान के विस्तार के मजबूत दीर्घकालिक वृद्धि रुझानों को दर्शाते हैं। इस क्षेत्र के विस्तार के साथ इकाइयों को औपाचारिक स्रोतों से कर्ज सुविधाओं में भी वृद्धि होने की उम्मीद है। इसके पश्चात भी इस क्षेत्र में पहले से चली आ रही ऋण की बड़ी कमी और बढ़ सकती है। ”
श्री बसु ने का कि इसे दूर करने के लिए औपचारिक वित्तपोषण के रास्तों का विस्तार जरूरी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2030 तक भारत का जीडीपी 537.96 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद है। इससे एमएसएमई का योगदान लगभग 215.18 लाख्ट्र करोड़ रुपये हो जाएगा। एमएसएमई के लिए वित्त तक पहुंच लंबे समय से एक चुनौती रही है। इस कमी को पूरा करने के लिए संगठित क्षेत्र की ओर से सुविधाएं बढ़ान की जरूरत के साथ साथ वित्त पोषण के नये और नवप्रवर्तक तंत्र विकसित करने की तत्काल आवश्यकता है।
बी2के एनालिटिक्स के अुसार देश में एमएसएमई क्षेत्र की लगभग 95 प्रतिशत इकाइयां अनौपचारिक रूप से संचालित की जाते हैं और यह ततथ्य इस क्षेत्र के लिए संगठत स्रोतों से कर्ज की राह में बड़ी चुनौती हैं।
फर्म ने सिफारिश की है कि इस क्षेत्र में कारोबार को आधिकारिक तरीके से करना एक प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए। बी2के एनालिटिक्स का कहना है कि जीएसटी रिटर्न दाखिल करने , यूपीआई और ऑनलाइन बैंकिंग जैसे डिजिटल भुगतान प्रणालियों को अपनाने से सत्यापित लेनदेन इतिहास बनता है, जिससे ऋणदाता वित्तीय स्थिति का बेहतर मूल्यांकन कर सकते हैं।
आधिकारिक रूप से सत्यापन योग्य प्रणालियां अपनाने से नकदी प्रवाह प्रबंधन में भी सुधार होता है तथा इकाइयों को अपने पैसे पर नियंत्रण मजबूत होता है। स्पष्ट वित्तीय रिकॉर्ड बना कर रखने से विश्वसनीयता बढ़ती है और प्राथमिकता क्षेत्र ऋण एवं सरकारी योजनाओं तक पहुंच की संभावना मजबूत होती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टॉक एक्सचेंज लिस्टिंग जैसे पूंजी जुटाने के विकल्प भी संचालन के औपचारिक रूप के जरिये ही अपनाए जा सकते हैं। इससे ऋण और शेयर पूंजी दोनों प्रकार के वित्तपोषण तक पहुंच आसान बनती है।
सियासी मियार की रीपोर्ट
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