विश्व शांति के लिये सबसे बड़ा ख़तरा है इस्राईल

दशकों से वैश्विक स्तर पर ईरान को एक खलनायक राष्ट्र के रूप में पेश करने की घिनौनी साज़िश रची जाती रही है। इस्राइल यह बार बार दोहराता रहा है कि उसे डर है कि यदि ईरान परमाणु बम बना लेता है तो उसका अस्तित्व ख़तरे में पड़ सकता है। यह दुष्प्रचार तब किया जाता है जबकि ईरान में इस्लामी क्रांति के नेता आयतुल्लाह ख़ुमैनी द्वारा परमाणु बम को मानवता विरोधी बताते हुये इसके निर्माण के विरुद्ध फ़तवा तक दिया जा चुका है। उधर ईरान के किसी भी धर्मगुरु या नेता ने आज तक परमाणु बम बनाने की बात भी नहीं की है। परन्तु इराक़ में सद्दाम हुसैन की तर्ज़ पर ईरान को भी केवल मीडिया प्रोपेगंडा कर बार बार खलनायक प्रमाणित करने की कोशिश की जाती रही है। दरअसल इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिकी-इस्राईली प्रभाव वाले ईरानी शासक मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी ने तो 1948 में इस्राइल को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता तो दी थी परन्तु 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान ने इस्राइल की मान्यता भी समाप्त कर दी साथ ही उसे “सियोनवादी शासन” भी घोषित कर दिया।
परन्तु यदि हम ईरान व इस्राईल के ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ को देखें तो 1967 के युद्ध में इस्राइल ने वेस्ट बैंक और ग़ज़ा पर क़ब्ज़ा जमाकर फ़िलिस्तीन पर अपना नियंत्रण करना शुरू कर दिया था। तब से लेकर आज तक इस्राइल पूरे क्षेत्र में बर्बरीयत व हिंसा करता आ रहा है। इसके पीछे उस ग्रेटर इस्राइल के गठन व निर्माण की एक ज़ायोनिस्ट (यहूदीवादी) विस्तारवादी अवधारणा काम कर रही है जिसके तहत एक ऐसे विशाल यहूदी राज्य की कल्पना की गई है, जो वर्तमान इस्राइल से कहीं ज़्यादा बड़ा हो और इसमें मध्य पूर्व के कई अरब देशों के क्षेत्रों को शामिल किया जा सके। इस योजना को आधुनिक राजनीतिक संदर्भ में एक विवादित इस्राईली विस्तारवादी परियोजना के रूप में देखा जाता है । ज़ायोनिस्ट के इस काल्पनिक ग्रेटर इस्राइल की भौगोलिक सीमाएं मिस्र की नील नदी से लेकर इराक़ की फ़ुरात (यूफ्रेट्स) नदी तक और मदीना से लेकर लेबनान तक शामिल हैं। यहाँ तक कि पूरा जॉर्डन, फ़िलिस्तीन (पश्चिमी तट व ग़ज़ा ), लेबनान, सीरिया, इराक़, मिस्र, सऊदी अरब के बड़े हिस्से,पवित्र स्थल मक्का, मदीना, और माउंट सिनाई पर क़ब्ज़ा भी इस योजना में शामिल माना जाता है। इसी दूरगामी योजना के मद्देनज़र इस्राईल की सरपरस्ती करते हुये अमेरिका ने दशकों से ईरान का भय दिखाकर तथा शिया सुन्नी मतभेदों को हवा देकर इसी की आड़ में मध्य पूर्व के अनेक देशों में अपने सैन्य ठिकाने भी बना रखे हैं।
दरअसल ईरान ही एक अकेला ऐसा देश है जोकि न केवल ग्रेटर इस्राइल रुपी इस विस्तारवादी परियोजना को खुलकर ख़ारिज करता है बल्कि फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों ग़ज़ा,वेस्ट बैंक व लेबनान आदि में इस्राईल द्वारा क़ब्ज़ा की गयी ज़मीन को भी मुक्त कराये जाने का पक्षधर है। यही वजह है कि ईरान, इस्राईल व अमेरिका की नज़रों में खटकता रहता है। ईरान की तेल सम्पदा पर भी अमेरिका अपनी गिद्ध दृष्टि जमाये रखता है। उधर अपनी इसी योजना को आगे बढ़ाते हुये अब तक इस्राईल ने आतंक व बर्बरता का वह इतिहास रचा है जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। उदाहरण के तौर पर ग़ज़ा में 7 अक्टूबर 2023 से 19 मई 2026 के मध्य इस्राइली सैन्य कार्रवाई में 72,772 से अधिक निहत्थे बेगुनाह फ़िलिस्तीनी मारे जा चुके हैं जबकि घायलों की संख्या 172,707 से भी अधिक है । मृतकों में आधे से अधिक महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं। इसी तरह लेबनान में भी मई 2026 तक इस्राईल के हमलों में 2,255 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। यहाँ भी मरने वालों में 122 बच्चे, 83 महिलाएं और 42 चिकित्सा कर्मी भी शामिल हैं।
यह इस्राइल ही है जिसने ईरान को ग्रेटर इस्राईल के रास्ते का सबसे बड़ा अड़ंगा समझते हुये अमेरिका को ईरान पर हमला करने के लिये उकसाया। हद तो यह है कि अमेरिका और इस्राइल ने परमाणु वार्ता के दौरान ईरान पर कम से कम दो बार हमला किया। पहला हमला 13 जून 2025 को यानी ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता के 5 राउंड की वार्ता के दो दिन बाद किया गया था। इस में इस्राइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाकर भीषण हमला किया, जबकि दोनों देश आगे बातचीत की योजना बना रहे थे। इसी तरह इस्राइल और अमेरिका ने दूसरा हमला 27 फ़रवरी 2026 को, अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता के बीच किया जिसमें ईरान में 30 जगहों पर हमला किया गया, जिसमें तेहरान में ईरानी ख़ुफ़िया एजेंसी की इमारतें, एयरपोर्ट्स, राष्ट्रपति भवन और रिहायशी इलाक़े शामिल थे। साथ ही तेहरान और इस्फ़हान जैसे 30 शहर भी अमेरिका-इस्राइल के निशाने पर थे। इसी हमले में मिनाब में स्कूल के 165 मासूम बच्चे,सर्वोच्च ईरानी नेता ख़ामनेई व अनेक उच्चाधिकारी शहीद हुये थे।
इसके अतिरिक्त विश्व में हिंसा व अशांति फैलाने के लिये इस्राईल अनेक बार युद्धविराम का उल्लंघन भी करता आया है। चाहे वह ग़ज़ा का युद्ध विराम हो या लेबनान का युद्ध विराम। इस्राइल ग़ज़ा युद्ध विराम 10 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी मध्यस्थता में लागू हुआ था। परन्तु युद्धविराम के बाद से अब तक लगभग 2000 बार इस्राईली सेना युद्धविराम का उल्लंघन कर चुकी है। और विराम के बाद 700 से अधिक फ़िलिस्तीनी मारे जा चुके हैं जबकि 3 हज़ार से ज़्यादा घायल हो चुके हैं। मानवता के विरुद्ध अपराध और युद्ध अपराध के कारण ही अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी किया हुआ है। इसके अतिरिक्त, तुर्की ने भी नेतन्याहू और 36 अन्य इस्राईली अधिकारियों के विरुद्ध नरसंहार के आरोप में अलग से गिरफ़्तारी वारंट जारी किए हैं ।
आश्चर्यजनक है कि परमाणु हथियार रखने वाला देश इस्राइल, जिसे विश्व के सबसे बड़े नरसंहारक देश के रूप में देखा जा रहा है, व उसका संरक्षक अमेरिका, यदि ईरान जैसे देश को परमाणु हथियार बनाने की झूठ आधारित कथित संभवनाओं के चलते महज़ प्रोपेगंडा फैलाकर विश्व शांति के लिये बड़ा ख़तरा बता रहे हैं जबकि ईरान का मानवता के विरुद्ध अपराध,युद्ध अपराध या दूसरे देशों की ज़मीन पर घुसपैठ जैसे कोई आरोप नहीं हैं। सच तो यह है कि इस्राईल ही विश्व शांति के लिये इस समय सबसे बड़ा ख़तरा है।
सियासी मियार की रीपोर्ट
Siyasi Miyar | News & information Portal Latest News & Information Portal