सुरक्षा की कीमत पर अभिजात वर्ग का मनोरंजन
-डा. रवीन्द्र अरजरिया-
देश की राजनैतिक मानसिकता पर आज भी गोरों का अहंकार स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है। बाह्य आक्रान्ताओं की तरह सर्वोच्च दिखना अब प्रतिष्ठा का मापदण्ड बन गया है। अंग्रेजी हुकूमत समाप्त होने के बाद भी उन्हें आदर्श मानने वालों की संख्या में निरंतर इजाफा होता जा रहा है। भाषा, पहनावा और क्लब आज भी अपने चमकीले वैभव की दास्तानें गढने में लगे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में अंग्रेजियत हावी है। हकीकत तो यह है कि भारतीय सांस्कृतिक संरचना अब अपने अस्तित्व की लडाई लगभग हार सी चुकी है। आधुनिकता के नाम पर चन्द लोगों ने वर्चस्व कायम कर रखा है। उच्च, मध्यम और निम्न वर्ग के निर्धारण को नियंत्रित करने वाला अभिजात वर्ग अपने धनबल, जनबल और पहुंच बल की दम पर समूचे राष्ट्र को नियंत्रित करने में लगा है। जब-जब इस अभिजान वर्ग को प्रभावित करने के प्रयास हुए तब-तब संवैधानिक अडचनें, दबाव की राजनीति और प्रलोभनों का बाजार गर्म होता रहा। वर्तमान में इसी वर्ग के लोगों का अतिप्रतिष्ठित जिमखाना क्लब चर्चाओं के मध्य में है। इतिहास की माने तो अंग्रेजों ने सन् 1913 में इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब के नाम से इसकी स्थापना की थी। समाज में श्रेष्ठता बोध करवाने वाले इस क्लब को मनोरंजन केन्द्र से कहीं विलायती जीवन शैली का प्रतिष्ठान बना दिया गया था। भारतीय नागरिकों को हीनता की भावना से ग्रसित करने हेतु इस क्लब में प्रवेश नहीं दिया जाता था। बाद में कुछ चाटुकारों को इसका सदस्य बना लिया गया ताकि राष्ट्रीय सम्मान बेचने कर श्रेष्ठ बनने की ललक वाले मीरजाफरों को ही अपनों के विरुद्ध हथियार बनाकर उपयोग किया जा सके। गोरी चालों को स्वाधीनता के मतवालों ने अपने प्राणों की आहुतियों से नस्तनाबूत कर दिया। देश स्वतंत्र हुआ परन्तु कुछ भी नहीं बदला। केवल गोरों के बैठने वाले सिंहासनों पर भूरे लोग बैठ गये। अभिजात वर्ग यथावत शक्तिशाली रहा। जिमखाना जैसे क्लब निरंतर विस्तार पाते चले गये। इन क्लबों में देश के आम नागरिकों का प्रवेश अब भी निषेध है। यहां की सदस्यता हेतु मोटी रकम, लम्बी प्रतीक्षा और पहुंचबल का खुला उपयोग अतिआवश्यक होता है। भारी भरकम बकायादार बने इस क्लब की लीज को सुरक्षा सहित अनेक कारणों से निरस्त करने वाले नोटिस को एक बार फिर कानूनी मकडजाल में फंसाकर अस्तित्वहीन करने की चालें चली जा रहीं हैं। ऐसे में जापान की प्राचीन चित्रात्मक कहावत सी नो ईविल, हियर नो ईविल, स्पीक नो ईविल का संदर्भ एक बार फिर उभर कर सामने आ जाता है। इस चित्र में पहले बंदर का नाम मिज़ारू रखा गया है जो आंखों को बंद रखता है। दूसरे बंदर का नाम किकाज़ारू रखा गया है जो कानों को बंद रखता है और तीसरे बंदर का नाम इवाज़ारू है जो मुंह को बंद रखता है। इसका सांकेतिक अर्थ बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो तथा बुरा मत बोलो के रूप में प्रस्तुत किया गया। देश की स्वाधीनता के बाद घोषित किये गये राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी ने भी अपने राजनैतिक जीवन के पूर्वार्ध में इसी चित्रात्मक कहावत को सत्य, अहिंसा और प्रेम का संदेशवाहक बनाया और प्रसिद्धि के नये मापदण्ड स्थापित किये। इसी कहावत के पहले भाग यानी सी नो इविल के नाम से वर्ष 2002 में संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रमुख विदेशी गुप्तचर संस्था सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी यानी सीआईए के पूर्व एजेंट रॉबर्ट बेयर की आत्मकथा प्रकाशित हुई जिसमें जिमखाना क्लब को मीरजाफरों के द्वारा गुप्त दस्तावेजों के आदान-प्रदान के महात्वपूर्ण स्थल के रूप में रेखांकित किया गया है। रॉबर्ट बेयर ने अपनी आत्मकथा में सन् 1970 के दशक की विश्व स्थितियों को विस्तार से बताया है। उस कालखण्ड में यूरोप की धरती पर नाटो और वारसॉ पैक्ट की सेनाएं एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी थीं। शीत युद्ध अपने चरम पर था। सोवियत संघ के हथियारों, उपकरणों तथा विस्फोटकों की तकनीक हासिल करने के लिए पेन्टागन और सीआईए ने एडी-चोटी का जोर लगा दिया था ताकि वह जवाबी कार्यवाही के लिए तैयारी कर सके। सोवियत संघ आमतौर पर भारत को अपने सबसे आधुनिक हथियार बेचता था। सो भारत के मीरजाफरों को चिन्हित करके उनके माध्यम से तकनीक जानकारी हासिल करने के प्रयास किये गये, जो सफल हुए। इस षडयंत्रकारी कार्य को सफलता तक पहुंचने में जिमखाना क्लब के रुतबे ने महात्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। सन् 1978 में भारतीय सेना ने सोवियत संघ से 500 टी-72, टी-72एम और टी-72एम1 टैंकों का पहला जत्था आयात किया। सीआईए एजेन्ट ने भारत के मीरजाफरों के सहायता से आयातित उपकरणों को प्राप्त करने के लिए तूफानी गति से प्रयास तेज कर दिये। राष्ट्रद्रोही भितरघातियों ने निर्धारित सौदे के तहत अगस्त के अन्तिम सप्ताह में टी-72 टैंक के मैनुअलों से भरा एक बैग कुछ समय के लिए रॉबर्ट बेयर के हवाले कर दिया। राबर्ट बेयर के लिए यह यह होली ग्रेल यानी पवित्र प्याला की तरह था, जिसका उपयोग ईसा मसीह ने अपने अंतिम भोज के दौरान किया था। समय अवधि में मेनुअलों से भरा बैग वापिस करना था ताकि देने वाला व्यक्ति अपनी डियूटी समाप्ति के पहले उसे तिजोरी में पुनः रख सके। अमेरिकी दूतावास में जाकर मैनुअल की कापी करने, उसे भितरघाती को वापिस करने तथा भारत की गुप्तचर संस्थाओं से बचकर रहने के जोखिम भरे काम में जिमखाना क्लब ने केन्द्रीय भूमिका का निर्वहन किया। इस क्लब में सीआईए एजेन्ट की कार बेघडक अन्दर चली गई जबकि उसका पीछा करने वाली इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी की गाडियां बाहर ही रुक गईं। टेनिस बैग में मैनुअल से भरा डफल बैग निर्धारित स्थान पर फैंकने के बाद सीआईए एजेन्ट पीछे वाले गेट से क्लब के अन्दर पहुंचा और वहां मौजूद क्लब के एक सम्भ्रान्त सदस्य के साथ बिना वर्फ के डबल स्कॉच के पैग लेने लगा। अमेरिकी दूतावास से मैनुअल की प्रतियां लैंगली स्थित सीआईए मुख्यालय तथा पेंटागन तक पहुंचाई गई। आश्चर्य होता है कि भारत में विदेशी सर्वे, विदेशी सर्वेक्षण तथा विदेशी जानकारियों पर हायतोबा मचाने वालों ने सीआईए के प्रकाशन समीक्षा बोर्ड की अनुमति के बाद सन् 2002 में प्रकाशित अमेरिकी एजेन्ट की इस किताब पर ध्यान ही नहीं दिया और न ही उसमें प्रकाशित तथ्यों को ही जांचने की कोशिश की। वे कौन से कारण हैं जिनके कारण इतने बडे षडयंत्र की तह तक जाने के प्रयासों पर ग्रहण लग गये। जिमखाना क्लब की तर्ज पर ही दिल्ली गोल्फ क्लब, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, इंडिया हैबिटेट सेंटर जैसी हजारों संस्थायें आज भी स्वाधीन भारत के नागरिकों को उनकी लाचारी का अहसास कराती प्रतीत हो रहीं हैं। ऐसे में क्लब के उपयोग, उसके तंत्र की संरचना और अभिजात वर्ग की एकतरफा मानसिकता से आम नागरिक हीनभावना, अभावबोध और अघोषित गुलाम जैसी स्थिति में पहुंच चुका है। आवश्यकता है तो समय रहते उच्च, मध्यम और निम्न वर्ग के मध्य परजीवी बने अभिजात वर्ग की कलुषित सोच को जड़ मूल से उखाड फैंकने की अन्यथा गरीब की झुग्गी पर चलने वाला बुलडोजर इस तरह के अभिजात वर्ग के बकायादार क्लब की तरफ कभी नहीं मुड सकेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
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