हिरोशिमा दिवस : युद्ध नहीं, शांति ही मानवता का भविष्य।

6 अगस्त को विश्वभर में हिरोशिमा दिवस मनाया जाता है। पाठक जानते होंगे कि यही वह दिन है, जब वर्ष 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर पहला परमाणु बम गिराया था। इस दिन विश्वभर में परमाणु हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है तथा शांति, परमाणु निरस्त्रीकरण और मानवता का संदेश दिया जाता है। आज, लगभग आठ दशक बाद भी, यह दिन केवल इतिहास का स्मरण भर नहीं है, बल्कि वर्तमान विश्व को चेतावनी देने वाला एक अवसर भी है। कहना गलत नहीं होगा कि आज पूरी दुनिया मानो बारूद के ढेर पर खड़ी है। हर ओर युद्ध, संघर्ष और तनाव का वातावरण दिखाई देता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में ईरान-इज़रायल के बीच बढ़ता तनाव और टकराव, गाज़ा में जारी संघर्ष तथा अन्य क्षेत्रीय विवाद वैश्विक शांति के सामने गंभीर चुनौती बन चुके हैं।
वास्तव में, युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होते, बल्कि वे नई समस्याओं की शुरुआत करते हैं। शांति ही मानवता का सबसे शक्तिशाली अस्त्र है। यही संदेश हमें भगवान गौतम बुद्ध के उपदेशों में भी मिलता है। धम्मपद, जो बौद्ध साहित्य के सबसे लोकप्रिय और प्रेरणादायक ग्रंथों में से एक है, गौतम बुद्ध के 423 उपदेशों (गाथाओं) का संग्रह है। इसमें कहा गया है-‘न हि वेरेण वेराणि सम्मन्तीध कुदाचनं।अवेरेण च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो।।’ अर्थात् वैर से वैर कभी समाप्त नहीं होता; वैर केवल प्रेम, करुणा और अहिंसा से ही समाप्त होता है। यही सनातन सत्य है। सच तो यह है कि गौतम बुद्ध का यह संदेश आज के युद्धग्रस्त विश्व में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। युद्ध हो या सीमा पर तनाव, आतंकवाद हो या नक्सलवाद अथवा किसी भी प्रकार का सशस्त्र संघर्ष-इनकी सबसे बड़ी कीमत हमेशा आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है। हजारों निर्दोष लोगों की जान चली जाती है, लाखों लोग अपने घर छोड़ने को विवश हो जाते हैं और आने वाली पीढ़ियाँ भय, असुरक्षा तथा मानसिक आघात के वातावरण में जीवन बिताने को मजबूर हो जाती हैं।
बहरहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि हिरोशिमा दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि युद्ध का अंतिम परिणाम केवल विनाश होता है। 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम ने पूरी दुनिया को यह भयावह सच्चाई दिखाई थी कि यदि युद्ध की आग परमाणु हथियारों तक पहुँच जाए, तो उसका दुष्परिणाम केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी मानव सभ्यता को उसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। वास्तव में, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि युद्ध ने मानवता को कभी नहीं जीता। हर युद्ध में एक इंसान दूसरे इंसान से लड़ता है, लेकिन अंततः कोई वास्तविक विजेता नहीं होता। यदि कुछ बचता है, तो वह है-उजड़े हुए शहर, बिछड़े हुए परिवार, मासूम बच्चों की चीखें, माताओं की सूनी गोद, युद्ध का काला धुआँ, लहू से सनी धरती और पीढ़ियों तक न भरने वाले घाव। इतिहास गवाह है कि युद्ध केवल सीमाएँ बदलते हैं, मनुष्य का भाग्य नहीं। तलवारें, मिसाइलें और बम कभी शांति स्थापित नहीं कर सकते; वे केवल भय, घृणा और विनाश को जन्म देते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्र हथियारों की होड़ के स्थान पर संवाद, कूटनीति और सहयोग का मार्ग अपनाएँ। विश्व शांति केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का भी नैतिक दायित्व है कि वह सहिष्णुता, करुणा और भाईचारे के मूल्यों को अपनाए। यदि मानवता ने इतिहास से सबक नहीं लिया, तो भविष्य में फिर किसी ऐसी त्रासदी का सामना करना पड़ सकता है, जिसकी भरपाई सदियों तक संभव नहीं होगी।
अंत में यहां पर यही कहना उचित होगा कि मानव सभ्यता का भविष्य युद्ध की विजय में नहीं, बल्कि शांति की विजय में सुरक्षित है। यही वह मार्ग है जो मानवता को विनाश से बचाकर सह-अस्तित्व, सद्भाव और स्थायी शांति की ओर ले जाता है।
सियासी मियार की रीपोर्ट
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