भीतर का तूफ़ान
— डॉ. प्रियंका सौरभ

फीकी हँसी मुख लिए, भीतर गहरा शोक।
हँसते-हँसते जी रहे, मन को कितना रोक॥
पगडंडी की छाँव थी, सड़कों का विस्तार।
सुविधाओं के बीच में, खोया अपना प्यार॥
फुर्सत जैसे खो गई, भाग रहा इंसान।
समय बहुत है पास में, फिर भी सब हैरान॥
जीवन की इस दौड़ में, खो बैठा अरमान—
फीकी हँसी मुख लिए, भीतर गहरा शोक॥
बूढ़ों की अब पूछ कम, बच्चों में अभिमान।
गमलों में बाग़ीचियाँ, सूना अपना धाम॥
मट्ठा-दही को भूलकर, कॉफी का सम्मान।
सादा जीवन खो गया, बढ़ा कृत्रिम मान॥
रिश्तों का रस सूखकर, रह गया बस शोक—
फीकी हँसी मुख लिए, भीतर गहरा शोक॥
चिट्ठी-पत्री खो गई, मोबाइल का राज।
पास खड़े हैं लोग सब, फिर भी दूर समाज॥
ए.सी. की आदत पड़ी, गर्म हुआ व्यवहार।
सुविधाओं के ढेर में, बढ़ता मन का भार॥
अपनेपन की छाँव बिन, सूना सारा लोक—
फीकी हँसी मुख लिए, भीतर गहरा शोक॥
दिखावे की भीड़ में, खोया सच्चा मान।
झूठी शान के वास्ते, गिरवी हुआ ईमान॥
जो खुद को सुधार ले, वही बने महान।
प्रेम, दया, विश्वास से, खिलता है इंसान॥
भीतर दीपक जो जले, फैले नव आलोक—
फीकी हँसी मुख लिए, भीतर गहरा शोक॥
सियासी मियार की रीपोर्ट
Siyasi Miyar | News & information Portal Latest News & Information Portal