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भावनाओं का ‘अवसरवादी आहतपन’

भावनाओं का ‘अवसरवादी आहतपन’

-निर्मल रानी

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और चंदे में कथित हेराफेरी के मुद्दे को उठाने के मक़सद से गत 31 जुलाई को पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने संसद परिसर में साधू के वेश में एक प्रतीकात्मक नाटक किया था। इस दौरान विपक्ष के भी कई नेता वहां मौजूद रहे। इसी प्रदर्शन में राहुल गांधी ने प्रतीकात्मक रूप से दानपात्र में पैसे डालने का प्रयास किया। इसके बाद पप्पू यादव ने दानपेटी लेकर भागने का नाटक किया और समाजवादी पार्टी के अयोध्या से सांसद अवधेश प्रसाद ने उन्हें पकड़ने का अभिनय किया। इस नाट्य मंचन रुपी प्रदर्शन के बाद भाजपा,विश्व हिंदू परिषद , बजरंग दल, व इसके समर्थक संत समाज ने इसे सनातन धर्म और साधु-संतों की छवि का अपमान बताया। सत्ता समर्थक कई संतों ने भी आरोप लगाया कि पप्पू यादव द्वारा संसद में ‘इस प्रकार भगवा वस्त्र और साधू का रूप धारण कर व इसका नाट्य मंचन कर साधु वेश का मज़ाक उड़ाया गया है, जिससे सनातन धर्म और संतों की आस्था को ठेस पहुंची है। लिहाज़ा इस मामले के विरोध में भाजपा नेताओं और धार्मिक संगठनों ने क़ानूनी क़दम उठाए। दिल्ली,वाराणसी,हरिद्वार,प्रयागराज,मथुरा,नागपुर,जम्मू सहित देश के अन्य कई शहरों में पप्पू यादव, राहुल गांधी और सपा सांसद अवधेश प्रसाद के ख़िलाफ़ धार्मिक भावनाएं आहत करने को लेकर कहीं पुलिस में शिकायतें व एफ़ आईआर दर्ज की गईं तो कहीं विरोध प्रदर्शन किये गये। कई मठों, मंदिरों और अखाड़ों ने पप्पू यादव के प्रवेश पर रोक लगाने और संसद से उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की। लोकसभा स्पीकर ने भी इसतरह का प्रदर्शन करने पर नाराज़गी जताई और इसे संसदीय गरिमा के विरुद्ध बताया। दिल्ली के ⁠जंतर-मंतर पर तो विभिन्न हिंदू संगठनों और अनेक साधु-संतों ने एकत्रित होकर ‘सद्बुद्धि हवन’ और धार्मिक अनुष्ठान किया। इसके अलावा दिल्ली में पप्पू यादव और उनकी पत्नी रंजीत रंजन के आधिकारिक आवास के बाहर हिंदू संगठनों ने ज़ोरदार नारेबाज़ी की और उनका सामाजिक व धार्मिक बहिष्कार करने की मांग की।
इसी बीच सांसद पप्पू यादव के दिल्ली स्थित आवास पर उन पर हमले की कोशिश हुई है, जहाँ गत 2 अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दो युवकों ने पप्पू यादव पर चप्पल फेंकी और कथित तौर पर उनपर चाक़ू से हमला करने का प्रयास किया। हालांकि घटनास्थल पर मौजूद सांसद समर्थकों ने दो आरोपियों को तुरंत पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। इन हमलावर आरोपियों का भी यही कहना था पप्पू यादव द्वारा सनातन धर्म, साधु-संतों और भगवा वस्त्रों का कथित तौर पर अपमान किया गया है और वे इसी पर आपत्ति जताने वहां गये थे। उधर पप्पू यादव ने भी दावा किया है कि उन्हें लगातार जान से मारने और ज़िंदा जलाने की धमकियां मिल रही हैं, लेकिन वे इससे डरने वाले नहीं हैं। सांसद उदित राज व शिवसेना सांसद संजय राउत जैसे अनेक नेताओं ने पप्पू यादव से मिलकर उनके प्रति समर्थन भी व्यक्त किया है। इन नेताओं ने पप्पू यादव पर हुये हमले को “कायराना” क़रार देते हुए कहा कि पप्पू यादव ने राम मंदिर के चंदे में हुई कथित हेराफेरी का मुद्दा उठाकर कुछ भी ग़लत नहीं किया। इन नेताओं ने प्रदर्शन का पुरज़ोर समर्थन किया था। इन नेताओं ने कहा कि भगवा रंग किसी पार्टी के नाम रजिस्टर्ड नहीं है और पप्पू यादव ने चंदा चोरी की झांकी दिखाकर सही सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी संसद परिसर के भीतर और बाहर इस पूरे विवाद में पप्पू यादव की लड़ाई का समर्थन किया। पप्पू यादव ने भी कहा कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी देश के 100 करोड़ लोगों की आस्था और सनातनी विचारों को बचाने के लिए उनके साथ खड़े हैं।
परन्तु समय समय पर लोगों की ‘धार्मिक भावनाएं ‘ आहत होने को लेकर देश में यह सवाल भी पूछा जाने लगा है कि जब सत्ताधारी नेताओं द्वारा न केवल साधु वेशभूषा का बल्कि सीधे देवी देवताओं तक का मज़ाक़ उड़ाया जाता है, उन्हें अपमानित किया जाता है उस समय आख़िर इन लोगों की भावनायें कहाँ चली जाती हैं ? याद कीजिये जब गत 4 जुलाई को भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लखनऊ के दो दिवसीय दौरे पर आए थे उस समय एयरपोर्ट से भाजपा मुख्यालय तक एक रोड शो आयोजित किया गया था। इस रोड शो के दौरान एक कलाकार भगवान हनुमान का वेश-रूप धारण किए अपने हाथ में भाजपा का झंडा लेकर नितिन नवीन के क़ाफ़िले के ठीक आगे नाच रहा था। इस दौरान नितिन नवीन सहित अनेक नेता हनुमान का नृत्य देख ‘रथ’ के ऊपर खड़े होकर मुस्कुराते नज़र आ रहे थे। तो क्या भाजपा के राजनीतिक रोड शो के लिए भगवान के स्वरूप का इस्तेमाल करना, भगवान हनुमान के स्वरूप को अपने स्वागत में सड़कों पर नचाना, क्या यह कृत्य हिंदू भावनाओं का अनादर करने वाला कृत्य नहीं था ? क्या यह राजनीति के लिए भगवान के स्वरूप का दुरुपयोग नहीं था?
इसी तरह जनवरी 2026 में अहमदाबाद में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव के दौरान साबरमती रिवर फ्रंट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ⁠जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज भी शामिल हुए थे। दोनों नेताओं ने वहां पतंग उड़ाई थी। प्रधानमंत्री मोदी और जर्मन चांसलर ने जिस विशेष पतंग को हवा में उड़ाया था, उस पर भगवान हनुमान की तस्वीर बनी हुई थी। क्या करोड़ों हिंदुओं के आराध्य देव भगवान हनुमान की तस्वीर को पतंग बनाकर हवा में उड़ाना देवताओं का मज़ाक उड़ाना नहीं है? उस समय इन्हीं हिंदू संगठनों की भावनाएं आहत क्यों नहीं हुई थीं ? इसी तरह मध्य प्रदेश के ग्वालियर में भगवान गणेश की कुछ ऐसी मूर्तियां स्थापित की गई थीं, जिन्हें आर एस एस का आधिकारिक गणवेश यानी सफ़ेद शर्ट, ख़ाकी हाफ़ पैंट और काले जूते पहनाया गया था। यहाँ तक कि भगवान गणेश के साथ-साथ उनके वाहन चूहे को भी संघ की ड्रेस पहनाई गई थी। इस मूर्ति में भगवान गणेश और मूषक को संघ की शाखाओं की तरह ‘ध्वज प्रणाम’ की मुद्रा में सीने पर हाथ रखकर खड़ा दिखाया गया था और उनके हाथों में संघ का भगवा झंडा भी थमाया गया था। क्या पप्पू यादव के साधू बनने पर आक्रोशित होने वालों ने उस समय यह सवाल उठाया था कि ‘हमारे आराध्य देव भगवान गणेश को आरएसएस का साधारण ‘कार्यकर्ता’ या ‘स्वयंसेवक’ बनाकर पंडालों में क्यों नचाया और खड़ा किया गया?’ क्या यह भगवान का अपमान और राजनीति के लिए उनका दुरुपयोग नहीं है? उस समय किसी भी हिंदू संगठन या संत समाज की भावनाएं आहत क्यों नहीं हुई थीं ?
इसके अलावा भी हज़ारों ऐसे उदाहरण हैं जिसमें भगवानों देवी देवताओं व संतों की वेश भूषा अपमानित होती नज़र आती है तथा धार्मिक भावनाएं भी आहत होती हैं। ऐसे में धार्मिक भावनाओं का आहत होना भी स्वाभाविक तो ज़रूर है परन्तु भावनाओं का ‘अवसरवादी आहतपन’ समझ से परे है।

सियासी मियार की रीपोर्ट