चों का खेल (बाल कहानी)

लखनपुर नामक एक गांव था। नया-नया बसा था। जो कोई इस गांव में रहना चाहता था वह इस गांव में आता थोड़ी जमीन पर कब्जा करता। अपनी जमीन पर निशान लगाता कि इतनी मेरी है और अपना मकान बनाना आरंभ कर देता।
चूंकि इस गांव के लोग सीधे-साधे थे इसलिए ये अपने पराए कि लड़ाई नहीं लड़ते थे जो जैसा करता उसे वैसा ही करने देते थे। इसी गांव में एक पंडित जी ने आकर अपना घर बनाया और अपने परिवार के साथ रहने लगे।
चूंकि पंडित जी अभी नये-नये आए थे इसलिए इन्हें लोगों को पहचानने में थोड़ा समय लगा था। वैसे पंडित जी थे तो सीधे-सादे पर थे तुनकमिजाज। इनकी सारी आदतें अच्छी थी पर इनमें एक खराब आदत भी थी। चों बोलने की। ये चों बहुत बोलते थे।
चूंकि यह एक बड़े पंडित थे इसलिए गांव के सभी लोग इनका आदर करते थे। बड़े लोग तो पंडित जी के चों कहने पर इतना ज्यादा ध्यान नहीं देते थे पर इनके गांव के बच्चे अव्वल नम्बर के शैतान थे। बातों को तो ऐसे पकड़ते थे जैसे बिल्ली चूहे को पकड़ती है बस फिर क्या था बेचारे पंडित जी। इन शैतान बच्चों ने इन्हें भी नहीं छोड़ा और बली का बकरा समझकर हलाल कर दिया।
एक दिन दोपहर में बच्चे पंडित जी के घर के सामने खेल रहे थे। उस समय पंडित जी सोने का मूड बना रहे थे कि बच्चे हो-हो करके ताली बजा-बजा कर हंसने लगे। पंडितजी को गुस्सा आ गया वैसे ये थे भी तुनकमिजाज। गुस्से में दरवाजे खोला और झांकते हुए बोले। चों यहां चों खेल रहे हो।
चों अपना घर समझ रखा है चों। बच्चे उस समय शांतिपूर्वक भाग तो गए लेकिन उन्होंने पंडित जी का चों शब्द रट सा गया था पर उन्हें इसका मतलब समझ में नहीं आ रहा था।
राम जो उनमें सबसे बड़ा था ने अपनी मां से पूछा- अम्मा ये चों क्यों कहते हैं।
मां ने कहा, बेटा, ये चों का अर्थ है क्यों। क्यों को वह चों कहते है।
सियासी मियार की रीपोर्ट
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