एपस्टीन फाइल पर घमासान- जनता के जानने का अधिकार और गोपनीयता पर उठे सवाल
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती जनता के जानने के अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा या गोपनीयता की आवश्यकता के बीच संतुलन साधना होता है। यह बहस इन दिनों अमेरिका में एपस्टीन फाइलों के प्रकाशन को लेकर चरम पर है। वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों से लेकर वैश्विक स्तर पर यह सवाल गूंज रहा है कि क्या जनता को वह सब जानने का हक है जो शक्तिशाली लोगों ने पर्दे के पीछे छिपा रखा है? लगभग एक दशक से इन फाइलों का इस्तेमाल डेमोक्रेट और रिपब्लिकन पार्टियों द्वारा एक-दूसरे पर राजनीतिक प्रहार करने के लिए किया जाता रहा है, लेकिन अब यह मामला केवल राजनीति तक सीमित नहीं रह गया है।
वर्तमान में ट्रंप प्रशासन के सामने सबसे बड़ी दुविधा जनता का वह आक्रोश है, जो दशकों से सच छिपाए जाने के कारण पैदा हुआ है। दुनिया भर में यह धारणा प्रबल है कि समाज के कुछ सबसे अमीर और रसूखदार लोगों ने गंभीर अपराध किए और कानून के लंबे हाथों से बच निकले। इसी दबाव और इसके राजनीतिक परिणामों को देखते हुए अमेरिकी कांग्रेस ने नवंबर 2025 में इन फाइलों को सार्वजनिक करने के पक्ष में मतदान किया था। हालांकि, फाइलों के बाहर आने की प्रक्रिया ने विवादों को शांत करने के बजाय और बढ़ा दिया है।
दरअसल, जिसे हम एपस्टीन फाइल कह रहे हैं, वह दस्तावेजों का कोई एक सेट नहीं है। इसमें संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) की लंबी जांच के दस्तावेज, अदालती रिकॉर्ड और ग्रैंड जूरी की कार्यवाही से जुड़ी सामग्रियां शामिल हैं। अब तक जो पन्ने सार्वजनिक हुए हैं, उनमें बड़े पैमाने पर संपादन किया गया है। महत्वपूर्ण नाम, पते, ई-मेल और तस्वीरों को काली पट्टियों से ढक दिया गया है। जहां कुछ मामलों में गोपनीयता के कानूनी कारण स्पष्ट हैं, वहीं कई जगहों पर बिना किसी ठोस आधार के सूचनाएं छिपाने से जनता के बीच यह संदेह गहरा गया है कि अब भी किसी को बचाने की कोशिश की जा रही है। अमेरिका हमेशा से खुद को एक स्वतंत्र और पारदर्शी समाज के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। विशेष रूप से वाटरगेट कांड के बाद, सरकारी ईमानदारी बहाल करने के लिए कई कड़े कानून बनाए गए। इनमें 1966 का सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम और उसके बाद के संशोधन शामिल हैं, जो एफबीआई और न्याय विभाग जैसे संस्थानों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाते हैं। लेकिन इन्हीं कानूनों के समानांतर 1974 का गोपनीयता अधिनियम भी मौजूद है, जिसका उद्देश्य व्यक्तियों की निजी जानकारी और प्रतिष्ठा की रक्षा करना है। एपस्टीन मामले में ये दोनों ही कानून आमने-सामने खड़े हैं। इस जटिल प्रक्रिया को अंजाम देने का जिम्मा संघीय नौकरशाही के कंधों पर है। चूंकि इसमें कई अलग-अलग एजेंसियां शामिल हैं, इसलिए फाइलों के संपादन में भी एकरूपता का अभाव दिख रहा है। एक एजेंसी जिस जानकारी को सुरक्षित मानती है, दूसरी उसे गोपनीयता के नाम पर छिपा देती है। इसके अलावा, ग्रैंड जूरी और अदालत के कई रिकॉर्ड अब भी सूचना की स्वतंत्रता कानूनों के दायरे से बाहर हैं। जब तक इन कानूनी और प्रशासनिक बाधाओं को पार कर पूर्ण पारदर्शिता नहीं बरती जाती, तब तक अधूरी सूचनाओं के आधार पर ऑनलाइन अटकलों का दौर थमता नजर नहीं आता।
सियासी मियार की रीपोर्ट
Siyasi Miyar | News & information Portal Latest News & Information Portal