नए ख्वाब

नए ख्वाब

-शबनम शर्मा-

आज मैं गुजरी उस सड़क से
कराहती सी आवाज थी आई
मैदान वो रोया, पीपल चीखा
बोलो मेरे बच्चे कहां है भाई?
इक्के-दुक्के बच्चे बैठे हाथों में
मोबाइल था भाई,
मैदानों की सारी खुशियां इस
डिबिया ने बेचकर खाई।
घास उग आई, कूड़ा भर गया
कहां रह गई अब वो मां जाई
जो कहती थी अपने लल्ला को
पल भर जा क्यूं न हवा मैदान की खाई?
खड़ी रही मैं मूक सी मूर्त
देती क्या मैं उसे जवाब
पूछते हैं जब मेरे ही बच्चे
खेल मैदान के, उनका ख्वाब
टी.वी., मोबाइल आज के खेल
रुक गई भईया बच्चों की रेल।

(रचनाकर से साभार प्रकाशित)

सियासी मियार की रीपोर्ट